जिन्दगी
के तीन पहर,
सुबह बालपण दोपहर जवानी छाएगी I
सुबह बालपण दोपहर जवानी छाएगी I
शाम आएगी बुढ़ापा लेकर तो,
रात यूँ ही टटोलते कट जाएगी I
बुढ़ापा बढ़ असहाय हुआ तो,
ढूंढे वो पल जो भजन भाव बताएगी I
पड़े निढाल हो बिछावन पर तो,
नित्य क्रिया भी उसी पे होएगी I
अपने ही ओलाद देख फटकारे,
छि: छि: कहे परयो सा दुत्कारे I
लगा नेह उम्र भर जिस स्त्री से,
पास फटकने वो भी नहीं आएगी I
कलह बन जाएगी कराह एक दिन,
पानी देते हुए स्त्री भी घिनाएगी I
स्वामी कह मनाये जग छोड़न को,
संग छोड़ कपूत मन भाएगी I
प्रभु प्रभु पुकार रहा अब मन,
प्राण पापी है की छोड़े नहीं तन I
जब तक रहा बुढ़ापे से दूर,
हाय संचय में लगा रहा मन I
छूटे प्राण संग चले सब कोई,
द्वार तक ही छोड़े रोते परजाई I
लगा कन्धा ले हरि का प्यारा नाम,
तू क्या सुने जब छोड़ चला भजन धाम I
पञ्च कर्मा कर मुख अग्नि दिया तो,
रोते सिसकते प्रिय भी चुप हो गई I
तोड़ खंखनी श्रद्धांजलि दिया तो,
पोछा चक्शु अब मन भर गई I
कैसा प्रेमी कैसा पति अब,
न स्नेह रहा न रही वो सती अब I
कर्म
कर कुछ देजा जग को,
मनगंगा
कर त्याग मद को I
स्वयं
परख न देख जन को,
रगड़ बिन पानी साबुन मन को I
रगड़ बिन पानी साबुन मन को I
महक जग में नए इत्र ऐसे,
खड़ा अरण्य चन्दन जैसे I
छूटा
साथ हुआ मोहभंग,
भुला
बिसरा क्षमा करें जग I
हुआ
विसर्जन अब बंद पाती,
संभालो
समझ किसी पागल की थाती।
No comments:
Post a Comment