Sunday, 22 November 2015

तिपहरी जिन्दगी की !



जिन्दगी के तीन पहर,
सुबह बालपण दोपहर जवानी छाएगी I

शाम आएगी बुढ़ापा लेकर तो,

रात यूँ ही टटोलते कट जाएगी I

बुढ़ापा बढ़ असहाय हुआ तो,

ढूंढे वो पल जो भजन भाव बताएगी I

पड़े निढाल हो बिछावन पर तो,

नित्य क्रिया भी उसी पे होएगी I

अपने ही ओलाद देख फटकारे,

छि: छि: कहे परयो सा दुत्कारे I

लगा नेह उम्र भर जिस स्त्री से,

पास फटकने वो भी नहीं आएगी I

कलह बन जाएगी कराह एक दिन,

पानी देते हुए स्त्री भी घिनाएगी I

स्वामी कह मनाये जग छोड़न को,

संग छोड़ कपूत मन भाएगी I

प्रभु प्रभु पुकार रहा अब मन,

प्राण पापी है की छोड़े नहीं तन I

जब तक रहा बुढ़ापे से दूर,

हाय संचय में लगा रहा मन I

छूटे प्राण संग चले सब कोई,

द्वार तक ही छोड़े रोते परजाई I

लगा कन्धा ले हरि का प्यारा नाम,
तू क्या सुने जब छोड़ चला भजन धाम I

पञ्च कर्मा कर मुख अग्नि दिया तो,

रोते सिसकते प्रिय भी चुप हो गई I

तोड़ खंखनी श्रद्धांजलि दिया तो,

पोछा चक्शु अब मन भर गई I

कैसा प्रेमी कैसा पति अब,

न स्नेह रहा न रही वो सती अब I

कर्म कर कुछ देजा जग को,
मनगंगा कर त्याग मद को I

स्वयं परख न देख जन को,
रगड़ बिन पानी साबुन मन को I

महक जग में नए इत्र ऐसे,

खड़ा अरण्य चन्दन जैसे I

छूटा साथ हुआ मोहभंग,
भुला बिसरा क्षमा करें जग I

हुआ विसर्जन अब  बंद पाती,
संभालो समझ किसी पागल की थाती।

No comments: