Sunday, 22 November 2015

झूठा दर्पण

रे मन तू जन जन को क्या देखे I रे मन..I 
तू वही तेरा तन भी वैसा,
होइहे सो गती औरन के लेखे, 
वो सम तू विसम जो ठहरा, 
औरन का लुटे अपना बिठा के पहरा, 
एक सुने तो अनेक सुनावे, 
एक हार बाद चालीश दिन हरावे, 
कहीं कम ना किसी से पीछे, 
बार बार क्या औरन को निरेखे I रे मन..I
अपना अपना अपना तीन हैं, 
धन प्रिया और जमीन है,
दूसरा गया एक धरे जब, 
तीनो गय हाथ मला अब,
विरले होत संसार में कहानी, 
तीनो मिले सब संग जवानी, 
औरन का पीछा तो जग जीवन को है, 
छोड़ हाय हाय आ अब मती को परखे I रे मन..I
कहे साधू सुनो सब बड़ भागा, 
जो न सुने सो बड़ा अभागा, 
वाणी, बचन कर्म और मन, 
इन सबका शुद्धी गति का साधन, 
छोटा मुँह बड़ बड़ बोलन लागु,
कहत संतन मठ छोड़ के भागु,
महा मूढ़ जग समझन लागु, 
अनपढ़ कैसे अब पाती लिखे I रे मन..I
रे मन तू जन जन को क्या देखे I

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