डायरी के पन्नों से
रमेश अस्पताल के बेड पर बेहोश पड़ा था। उसके गले का ऑपरेशन हुआ था और डॉक्टरों ने साफ़ कह दिया था कि अब उसकी ज़िंदगी के दिन गिने-चुने हैं। पास ही उसके दोनों बच्चे—चौदह साल की निशा और ग्यारह साल का सुरेश—खड़े सिसक रहे थे।
डॉक्टर ने दोनों बच्चों को अपने पास बुलाया और हालचाल समझाया। निशा ने हिम्मत करके पूछा— “डॉक्टर साहब, पापा कब तक होश में आ जाएँगे?”
डॉक्टर ने नरमी से कहा, “बेहोशी की दवा की मियाद चार घंटे की होती है। ऑपरेशन में दो घंटे लगे हैं। एक घंटा हो चुका है। उम्मीद है, एक घंटे में तुम्हारे पापा होश में आ जाएँगे।”
इतना कहकर डॉक्टर बाहर चले गए। निशा अपने हाथ में पड़ी डायरी को सीने से लगाए सुरेश का कंधा थामे बाहर कुर्सी पर बैठ गई। यह वही डायरी थी, जो नर्स ने उसे देते हुए कहा था— “गुड़िया, ये तुम्हारे पापा की डायरी है। ऑपरेशन से पहले कह गए थे कि होश न आए तो बच्चों को दे देना।”
निशा ने काँपते हाथों से डायरी खोली। कुछ पन्ने पलटने के बाद वह एक जगह ठहर गई और पढ़ने लगी—
मेरे दोनों बच्चे बहुत छोटे थे—निशा छह साल की और सुरेश तीन साल का—जब मेरे घर पहली बार पुलिस आई। उस दिन न मैं खुद को समझा सका, न अपनी सच्चाई किसी को दिखा पाया। पुलिस के आने के बाद पड़ोसियों की नज़रें बदल गईं। जो लोग कल तक मेरे अपने थे, आज मुझसे मुँह फेरने लगे।
इन सब बातों ने मेरे मन में गहरी टीस पैदा कर दी। कई बार सोचा—सब कुछ छोड़कर कहीं दूर चला जाऊँ, जहाँ शोर न हो, जहाँ ज़िंदगी सुकून से जी जा सके। लेकिन बच्चों के चेहरे सामने आते ही हिम्मत टूट जाती थी।
मैंने अपनी पत्नी को बहुत समझाया कि हमारे रोज़-रोज़ के झगड़े बच्चों पर बुरा असर डाल रहे हैं। या तो हम अलग-अलग रहकर बच्चों की पढ़ाई का इंतज़ाम करें, या वह बच्चों को लेकर मायके चली जाए। लेकिन उसने साफ़ मना कर दिया। उल्टा मुझसे ही कह दिया कि मैं अपने बच्चों को लेकर अलग हो जाऊँ।
एक दिन मैं बच्चों को लेकर अपने गाँव चला गया। करीब दो साल बाद हालात ऐसे बने कि क़ानून और समाज के दबाव में बच्चों को उनकी माँ के पास भेजना पड़ा। उस दिन बच्चों के बिलखते चेहरे देखकर मेरा कलेजा फट गया, मगर मैं कुछ कर नहीं सका।
वक़्त बीतता गया। ज़िंदगी की उसी भागदौड़ में एक शादी के मौके पर गायत्री से मुलाक़ात हुई। वह विधवा थी और उसके भी दो बच्चे थे। घरवालों की रज़ामंदी और आपसी सहमति से हम दोनों ने साथ रहने का फ़ैसला कर लिया।
शुरुआत के दिन अच्छे थे। मैं उसके बच्चों में अपने बच्चों को देखने लगा और वह मेरे हालात समझकर मुझे अपनाने लगी। लगा, शायद ज़िंदगी अब पटरी पर आ जाएगी।
लेकिन धीरे-धीरे सब बदलने लगा। गायत्री नहीं चाहती थी कि मेरे बच्चे हमारे साथ रहें। बात-बात पर दूरी बढ़ने लगी। प्यार में ठंडापन आ गया और मैं फिर से अकेला पड़ता चला गया।
इस अकेलेपन ने मुझे नशे की तरफ़ धकेल दिया। जो बातें होश में नहीं कह पाया, उन्हें नशे में कहने लगा। इसी नशे में मैंने एक ऐसी गलती कर दी, जिसका पछतावा आज भी मेरी आत्मा ढो रही है।
बाद में गायत्री ने बताया कि उसके मायके वाले और बच्चे गाँव लौटना चाहते हैं। वह दो पाटों के बीच फँस गई थी। उस दिन मुझे सब समझ आ गया—बच्चे जब अपने फैसले लेने लगते हैं, तब रिश्ते बोझ बन जाते हैं।
मैं उसे वहीं छोड़कर लौट आया। उसके बाद सीने का दर्द बढ़ता गया और नशा भी। कब बीमारी ने मुझे घेर लिया, पता ही नहीं चला। डॉक्टरों ने बताया—कैंसर।
मैंने ऊपरवाले का शुक्रिया अदा किया। लगा, चलो अब इस बेकार होती ज़िंदगी को किनारे लगाने का बहाना तो मिला।
एक रात मैं घर लौटा, अपना सामान समेटा, डायरी उठाई और बिना पीछे देखे निकल पड़ा। दिल्ली की बस पकड़ी और एक अनजान मंज़िल की ओर चल दिया।
यही मेरी कहानी है। अगर कभी मेरे बच्चे ये पन्ने पढ़ें, तो बस इतना समझें— उनका पिता उन्हें छोड़कर नहीं गया था, हालात से हार गया था।
निशा की आँखों से आँसू बहने लगे। उसने डायरी बंद की और अपने भाई को सीने से लगा लिया। बाहर से डॉक्टर की आवाज़ आई— “बच्चों… आपके पापा को होश आ रहा है।”
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