Sunday, 1 November 2015

आधी ज़िन्दगी आधी मौत


डायरी के पन्नों से – एक संकलित कथा

डायरी के पन्नों से

रमेश अस्पताल के बेड पर बेहोश पड़ा था। उसके गले का ऑपरेशन हुआ था और डॉक्टरों ने साफ़ कह दिया था कि अब उसकी ज़िंदगी के दिन गिने-चुने हैं। पास ही उसके दोनों बच्चे—चौदह साल की निशा और ग्यारह साल का सुरेश—खड़े सिसक रहे थे।

डॉक्टर ने दोनों बच्चों को अपने पास बुलाया और हालचाल समझाया। निशा ने हिम्मत करके पूछा— “डॉक्टर साहब, पापा कब तक होश में आ जाएँगे?”

डॉक्टर ने नरमी से कहा, “बेहोशी की दवा की मियाद चार घंटे की होती है। ऑपरेशन में दो घंटे लगे हैं। एक घंटा हो चुका है। उम्मीद है, एक घंटे में तुम्हारे पापा होश में आ जाएँगे।”

इतना कहकर डॉक्टर बाहर चले गए। निशा अपने हाथ में पड़ी डायरी को सीने से लगाए सुरेश का कंधा थामे बाहर कुर्सी पर बैठ गई। यह वही डायरी थी, जो नर्स ने उसे देते हुए कहा था— “गुड़िया, ये तुम्हारे पापा की डायरी है। ऑपरेशन से पहले कह गए थे कि होश न आए तो बच्चों को दे देना।”

निशा ने काँपते हाथों से डायरी खोली। कुछ पन्ने पलटने के बाद वह एक जगह ठहर गई और पढ़ने लगी—


मेरे दोनों बच्चे बहुत छोटे थे—निशा छह साल की और सुरेश तीन साल का—जब मेरे घर पहली बार पुलिस आई। उस दिन न मैं खुद को समझा सका, न अपनी सच्चाई किसी को दिखा पाया। पुलिस के आने के बाद पड़ोसियों की नज़रें बदल गईं। जो लोग कल तक मेरे अपने थे, आज मुझसे मुँह फेरने लगे।

इन सब बातों ने मेरे मन में गहरी टीस पैदा कर दी। कई बार सोचा—सब कुछ छोड़कर कहीं दूर चला जाऊँ, जहाँ शोर न हो, जहाँ ज़िंदगी सुकून से जी जा सके। लेकिन बच्चों के चेहरे सामने आते ही हिम्मत टूट जाती थी।

मैंने अपनी पत्नी को बहुत समझाया कि हमारे रोज़-रोज़ के झगड़े बच्चों पर बुरा असर डाल रहे हैं। या तो हम अलग-अलग रहकर बच्चों की पढ़ाई का इंतज़ाम करें, या वह बच्चों को लेकर मायके चली जाए। लेकिन उसने साफ़ मना कर दिया। उल्टा मुझसे ही कह दिया कि मैं अपने बच्चों को लेकर अलग हो जाऊँ।

एक दिन मैं बच्चों को लेकर अपने गाँव चला गया। करीब दो साल बाद हालात ऐसे बने कि क़ानून और समाज के दबाव में बच्चों को उनकी माँ के पास भेजना पड़ा। उस दिन बच्चों के बिलखते चेहरे देखकर मेरा कलेजा फट गया, मगर मैं कुछ कर नहीं सका।

वक़्त बीतता गया। ज़िंदगी की उसी भागदौड़ में एक शादी के मौके पर गायत्री से मुलाक़ात हुई। वह विधवा थी और उसके भी दो बच्चे थे। घरवालों की रज़ामंदी और आपसी सहमति से हम दोनों ने साथ रहने का फ़ैसला कर लिया।

शुरुआत के दिन अच्छे थे। मैं उसके बच्चों में अपने बच्चों को देखने लगा और वह मेरे हालात समझकर मुझे अपनाने लगी। लगा, शायद ज़िंदगी अब पटरी पर आ जाएगी।

लेकिन धीरे-धीरे सब बदलने लगा। गायत्री नहीं चाहती थी कि मेरे बच्चे हमारे साथ रहें। बात-बात पर दूरी बढ़ने लगी। प्यार में ठंडापन आ गया और मैं फिर से अकेला पड़ता चला गया।

इस अकेलेपन ने मुझे नशे की तरफ़ धकेल दिया। जो बातें होश में नहीं कह पाया, उन्हें नशे में कहने लगा। इसी नशे में मैंने एक ऐसी गलती कर दी, जिसका पछतावा आज भी मेरी आत्मा ढो रही है।

बाद में गायत्री ने बताया कि उसके मायके वाले और बच्चे गाँव लौटना चाहते हैं। वह दो पाटों के बीच फँस गई थी। उस दिन मुझे सब समझ आ गया—बच्चे जब अपने फैसले लेने लगते हैं, तब रिश्ते बोझ बन जाते हैं।

मैं उसे वहीं छोड़कर लौट आया। उसके बाद सीने का दर्द बढ़ता गया और नशा भी। कब बीमारी ने मुझे घेर लिया, पता ही नहीं चला। डॉक्टरों ने बताया—कैंसर।

मैंने ऊपरवाले का शुक्रिया अदा किया। लगा, चलो अब इस बेकार होती ज़िंदगी को किनारे लगाने का बहाना तो मिला।

एक रात मैं घर लौटा, अपना सामान समेटा, डायरी उठाई और बिना पीछे देखे निकल पड़ा। दिल्ली की बस पकड़ी और एक अनजान मंज़िल की ओर चल दिया।

यही मेरी कहानी है। अगर कभी मेरे बच्चे ये पन्ने पढ़ें, तो बस इतना समझें— उनका पिता उन्हें छोड़कर नहीं गया था, हालात से हार गया था।


निशा की आँखों से आँसू बहने लगे। उसने डायरी बंद की और अपने भाई को सीने से लगा लिया। बाहर से डॉक्टर की आवाज़ आई— “बच्चों… आपके पापा को होश आ रहा है।”

में बेहोश पड़ा था उसके दोनों बच्चे निशा और सुरेश उसके पास खड़े सिसक रहे थे I रमेश के गले का ऑपरेशन हुआ था वो अपनी जिन्दगी के कुछ आखिरी दिनों का सामना कर रहा था I डॉक्टर और रमेश के दोनों बच्चे रमेश के होश में आने का इंतजार कर रहे थे। डॉक्टर दोनों बच्चो को अपने पास बुलाते हुए उनका परिचय लेने लगे, निशा- मैं 14 साल की हुँ, मेरा भाई 11 साल का, कहती हुई निशा ने डॉक्टर से पुछा- पापा कब तक उठ जायेंगे डॉक्टर साहब? देखो बेटा बेहोशी की इंजेक्शन की मियाद तो चार घण्टे की है, दो घण्टे आपरेशन में लगे, एक घण्टे से हम इनके पास ही है, और एक घण्टे में आप के पापा होश में जायेंगे। कहते हुए डॉक्टर कमरे से बाहर जाने को उठ खड़े हुए। ठीक है डॉक्टर साहब-निशा ने कहा और अपने हाथ में पड़े डायरी को अपने सीने से मिंचति हुई सुरेश के कन्धे पकडे कमरे के बाहर पड़े कुर्सी पर कर बैठ गई

निशा उस डायरी को पलटना शुरू किया जिसे उसे नर्स ने ये कहते हुए दिया था - गुड़ियाँ डायरी तुम्हारे पापा के पास थी, ऑपरेशन के लिए जाते समय मुझे कहकर गए थे की मैं आप को दे दूँ। डायरी पलटते-पलटते निशा एक जगह रुक गई और पढ़ना शुरू किया………!

 मेरे दोनों बच्चे छोटे थे निशा 6 साल की थी और सुरेश 3 साल का जब मेरे घर पहली बार पुलिस आई, उस दिन पुलिस को मैं कुछ भी समझा सका ही उन्हें सच दिखा सका। पुलिस से पाला पड़ते ही आस पड़ोस के लोग मुझे हकारत भरी नजरो से देखने लगे I जो मेरे साथ समय गुजारना चाहता वो अब मुझसे सीधी मुह बात भी नहीं करता, आय दिन इन बातो को देखते सुनते झेलते मेरे मन में टीस उठती I मेरा मन ये कहने लगा की मैं सब कुछ छोड़ कर ऐसी जगह चला जाऊ, जहाँ किसी भी तरह की हर-हर पट-पट हो I जिंदगी सुकुन से जिऊँ, पर मेरी नजर बच्चो पर पड़ी तो मन मसोस कर रह गया। अपने बच्चे को लेकर वहाँ से कहीं और या अपने गाँव आकर रहने के बारे में सोचने लगा।

एक दिन मैं अपनी पत्नी को समझाने में कामयाब हो गया की, हमारे आपस में टयूनिंग मिलने और रोज-रोज झगड़े की वजह से हमारे बच्चो के ऊपर गलत असर पड़ेगा। हमे या तो बच्चे अलग रख कर पढ़ाना-लिखाना चाहिए या तु इन दोनों को लेकर घर जाकर रह। पर उस औरत ने घर जाकर रहने से साफ़ मना कर दिया, और कहने लगी की तुम्ही अपना और अपने बच्चो का रास्ता अलग कर लो। उसकी इस फैसले से मैं एक दिन बच्चो को लेकर अपने घर चला गया। तकरीबन दो साल बाद मेरी पत्नी को लोगो के धिक्कार और कानुन का ज्ञान हो जाने की वजह से बच्चो को उसके पास रखने पड़े। उस दिन बच्चो को उसके पास छोड़ते समय बच्चो के बिलखते चेहरे देखा मेरा सीना फटता रहा पर मैं क्या करता, ना मै उसके साथ रह सकता था और ना ही बच्चो को लेकर अलग रह कमा खा सकता था।

उस औरत ने औरत होने का भरपुर फ़ायदा उठाया और मुझे कही का नहीं छोड़ा। मैं उसके ऐसी व्यवहार के वजह से अपने बच्चो से दूर होता चला गया। वो मुझे तलाक देने को राजी नहीं, बिना तलाक मेरे बच्चे मेरे साथ रह नहीं सकते थे। इन्ही चिंताओ, परेशानियों के साथ लिए जिंदगी कटती रही। यही कोई दो साल बाद किसी शादी में मैं अपने घर आया हुआ था, वहीँ मेरे रिस्ते की एक औरत मुझे मिली, उसके पति की मौत हो चुकी थी और उसके पास भी दो बच्चे थे, दोनों की उम्र मेरे बच्चो के ही समान थे। उस औरत नाम था गायत्री, मेरे बड़े भाई, भाभी के कहने और हम दोनों के आपसी रजामन्दी से हमने एक- दुसरे के सुख-दुःख मिलकर बाँटने का फैसला कर लिया, और एक दिन मंदिर में जा औपचारिकताएं पूरी कर एक साथ रहने लगे।

गायत्री के संग मेरी पहली रात आई हम दोनों ही एकदूसरे की बीती जिंदगी के बारे में जानने को उत्सुक थे, मेरी अपनी बाते ख़त्म होने से पहले ही गायत्री ने मुझे टोका - तो क्या वो औरत बिना तलाक के तुम्हे मेरे साथ आराम से रहने देगी? हाँ हाँ कियूं नहीं-ये मेरे लब्ज थे। वो जिंदगी से भटक गई है उसे पारिवारिक बंधन नहीं आज़ादी चाहिए, यही वजह है की हम दोनों के बिच कोई बात नहीं बनती, वो गाँव नहीं आएगी उसे माँ बाप परिवार किसी से कोई मतलब नहीं उसे सिर्फ बच्चे और पैसा चाहिय। हम दोनों के अलग होने और बच्चो को उसे देने की सर्त भी यही है की मैं अपनी जिंदगी अपनी तरह से जियूँ और वो अपनी तरह से इसका मेरे पास उसका लिखित सुबूत है। और इसी सुबूत पर मैं बच्चो को अपने पास लाउंगा उसके पास नहीं छोडूंगा उसके परिवार उसके कितने दिन काम आएंगे ?
          
उस रात गायत्री को मैंने अपने बारे में सब कुछ बता दिया, हम दोनों हँसी खुसी रहने लगे उन दोनों बच्चो में ही अपने बच्चो को देख उन्हें अपना बचा प्यार बांटने लगा, उनके हर दुःख-सुख को अपना समझ अपनो से ज्यादा करने की कोशिश करता रहा। गायत्री भी मुझे मेरे व्यवहार और परिवारिक परिस्थितियो के समझ की वजह से बहुत प्यार करने लगी। मैं अपना गम धीरे-धीरे भुलाता गया, और ये दिन हरदम ऐसे ही कटता रहे इसकी कामना करने लगा। जिंदगी हँसी-खुशी कटती चली गई एक दिन अचानक गायत्री मेरे अपने बच्चो से बात-चित करने उनको ख़र्च आदि की लेनदेन को लेकर बहस करने लग गई। मैंने उसे साफ़ लब्जो में बता दिया की मुझे तुम्हारे बच्चो से कोई दिक्कत नहीं तो तुम्हे मेरे बच्चो से क्या परेशानी है

दरअसल गायत्री चाहती थी की मैं अपने बच्चो को उसके पास ना लांऊ, शायद उसके बच्चों का प्यार बट जाता या फिर उसे उनके प्रति जिम्मेदारी बढ़ जाती, जो भी हो मैंने कहा ठीक है जैसी तुम्हरी मर्जी नहीं लाऊंगाI उस दिन तो गायत्री मेरी बातो से सहमत हो गई, पर वो मुझसे बाते कम करने लगी, मुझसे अक्सर कटी-कटी सी रहने लगी। प्यार में भी उजड़ापन गया, मेरे प्रति लापरवाह हो गई। हम दोनों के बीच अब वो बात नहीं रही जो अब तक चली रही थी।

मैं एक बार फिर अपने पुराने जख्मो से उठते ठीस को महसुस करने लगा, कभी-कभी ऐसा लगता जैसे मुझे इस जहाँ में भेजने वाले ने गृहस्थ जीवन के लिए नहीं बल्कि औरतो के हाथो का खिलौना बना कर भेजा है। गायत्री के रूखेपन से मैं अंदर ही अंदर टूट गया। कभी-कभी सोचता इतना वफादार होते हुए मुझे दुनियाँ में किसी का वफा क्युँ नहीं मिली? मेरी अपनी औरत होते हुए भी गायत्री के पास मेहमान बन कर रहा। मेरे अपने बच्चे होते हुए मुझे पापा कहकर बुलाने वाला कोई नहीं दिखा। गायत्री के व्यवहार से मुझे वो दिन याद आने लगे जब किसी ने उस वक्त मुझसे कहाँ था - देख मेरे भाई भावनाओ के हाथो मजबुर सब कुछ तो तू ठीक ही कर रहा है, पर जिंदगी में जो अपना नहीं वो फिर जिंदगी भर सपना बन कर रह जाता है।


मुझे समझ नहीं आ रहा था की आखिर गायत्री मेरे साथ ऐसी हरकते कर क्यूँ रही है? पुरा दिन तो काम काज में मेरा मन लगा रहता तो दिन काट जाता पर घर आते ही मेरे चैन उड़ जाते, गायत्री के बेरुखी से मैं धीरे-धीरे नशे का आदि होने लगा I और अब मैं भी चाहते हुए गायत्री और उसके दोनों बच्चो के प्रति गैर जिम्मेदार होता चला गया। एक दिन नशे में मैंने गायत्री से कुछ बात करना चाहा, बिना नशे में तो वो मेरी किसी भी बातो का हुँ, हाँ, ना, नहीं में जवाब दे असली मुदो को टाल जाती। मैं कई बार अपनी गलतियों के बारे में बात कर हम दोनों बीच पैदा हुए विवादो को दूर करना चाहा। पर मैं ये भुल गया की जो औरत सिधे मन कुछ कहने सुनने को राजी नहीं वो नशे में रहते मुझसे क्या बाते करेगी?

नशे में धुत खुद में गायत्री के लिए उमड़ते प्यार को- सिगरेट के उठते धुँए से जला जल कर उड़ा चूका था। उस दिन मैं तो जैसे अपने जिंदगी में खेले गए इस खेल का हिसाब माँगने को आतुर था। उस दिन तो मेरी आत्मा मुझे तब- तक झिंझोड़ती रही जब तक मैंने गायत्री से ये नहीं पुछ लिया की- बता तुझे आज क्या हो गया, मैंने तेरा क्या बिगड़ दिया, जिस वजह से तुने मेरा जिना दुस्वार कर दिया I ऐसी जगह ला कर मुझे ला कर छोड़ दिया जहाँ से आगे-पीछे कोई रास्ता नहीं बच जाता, जिस पर अकेले चलना नामुमकिन हो। अगर तुझे मेरे साथ यही करना था, तो क्युँ जिंदगी भर साथ निभाने के वादे किय, वो वादे तेरे कहाँ गय जब तु मेरे साथ तन्हाई में किया करती थी? बता आज तुझे मेरे हर शवाल का जवाब देना ही होगा।


जाने मैं क्या-क्या बड़बड़ाता रहा, गायत्री अपना सर झुकाए सब कुछ सुनती रही, कभी-कभार अपना सर उठाकर बच्चो को बाहर से आने को देखती रही, जिन्हे मैंने ये कह कर बाहर भेज दिया था की मुझे तुम्हारी मम्मी से कुछ बात करनी है जाओ खेलो थोड़ी देर बाद आना I फिर भी गायत्री मुझसे कुछ बात नहीं कर रही थी। उसे दोनों हाथो को पकड़ उठाया और उसे झिंझोड़ते हुए चिल्लाया- मैं इतने देर से बक-बक किय जा रहा हुँ तेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा है? बता तु आज मुझे पिछले एक साल से मेरे साथ ये कौन सा खेल खेल रही है? मेरे कुछ भी कहने का गायत्री पर कोई असर नहीं हो रहा था, ना ही वो कुछ बताना चाह रही थी। मैं तो जैसे उसके इस बेरूखेपन से पागल सा हो रहा था, उसकी इस कदर चुप्पी मुझे और बिचलित कर रही थी। अचानक मेरा हाथ उठा और उसके चेहरे पर जाकर जोर का पड़ा, चेहरा पकड़ वो शिसकने लगी और घबराई हुई सी बोली-आज आप नशे में हो कल मैं आप को सारी बात बताऊँगी। ठीक है चल तु कल ही मुझे बताना लेकिन कल भी कुछ नहीं बताया तो मैं तुझे छोडुंगा नहीं याद रखना, मैं अपने बातो पर थोड़ा और जोर देते हुए बोला।  


उस दिन के बाद मेरे गुमशुदगी के दो दिन और गुजर गय, मेरे गुस्से का पारा चढ़ते जा रहा था, लाजमी था मेरी जगह कोई और होता तो शायद वो तो सारी हदे पार कर चुका होता। तीसरे दिन उसने मुझे पार्क में चलने को कहा, मैं उसे लेकर पार्क में गया, वो एक चबूतरे पर बैठ गई और सर झुका कुछ सोचने लगी। मैं खीजते हुए बोला- तरी ये नौटंकी बहुत हो गई, चल अब दुसरे ड्रामे का डायलॉग बोलना शुरू कर। या कहने में शर्म आ रही है की मेरी जगह कोई दूसरा मर्द पसंद आ गया? बोल वर्ना- कहते हुए मैंने अपना हाथ एक बार फिर उस पर उठा लिया था। मैं आप से ये बात कहना तो नहीं चाहती थी पर मेरी मज़बूरी है- गायत्री ने कुछ कहना शुरू किया। मुझे उसके चेहरे के भाव से लगा की वो शायद किसी कशमकश में है।

उसके माशुमियत पर मेरा गुस्सा जाता रहा, मैं नम्र होकर बोला- देखो गायत्री मैंने आज तक तुम्हे, तुम्हारे दोनों बच्चो को कभी पराया समझा या परायो सा व्यवहार किया है? नहीं - गायत्री ने कहा I क्या मैं कभी अपनी जिम्मेदारी से भागना चाहा? गायत्रि मेरी तरफ देखती हुई बोली- नहीं मैंने कभी आप को ऐसा कुछ नहीं कहा। तो तुम्हारी क्या मज़बूरी है? मैंने अपनी बातो पर जोर देकर बोला। उसके बाद गायत्री ने अपनी मज़बूरी बताना शुरू किया- मेरे घरवाले (मायके) कह रहे है की मैं आप के साथ न रहुँ, और मेरा बड़ा बेटा (जो की अब- 10 साल का हो चुका था) भी कहता है की, अब हम अपने घर चल कर रहे।

अब आप ही बताओ की मैं क्या करूँ - गायत्री रुआँसी होकर बोलती रही- मैं आप को छोड़ना नहीं चाहती पर मेरे पहले ससुराल से मुझे कुछ नहीं मिलेगा, मिले कोई बात नहीं, बच्चे वहीं जाकर रहना चाहते है जहाँ उनका गाँव है, मैं तो दोनों तरफ से फसी हुँ। किसको छोडु किसके साथ रहुँ? मेरे समझ में नहीं आ रहा है। गायत्री बोलती रही- अब आप ही बताओ की मैं क्या करू? मेरा बड़ा भाई कहता है, जैसा तेरे बच्चे कहते है वैसा कर I ठीक है ठीक है मैं समझ गया। मैंने उसे बीच में रोकते हुए बोला। मेरी समझ में सारी बात आ गई- ये भी एक दिन किसी ने मुझ से कहा था की जिस दिन तुम्हारे बच्चे समझदार हो गय उसी दिन मेरा तुम्हारे पास रहना किसी को अच्छा नहीं लगेगा। बच्चे जब छोटे थे तब उन्हें पालने और खिलाने की बात थी तब किसी ने नहीं सोचा था की ये दिन भी एक आनेवाला है, खैर- जो भी होता है अच्छा ही होता है पर कही, कभी किसी को वो बात बुरा लग जाता है। मैंने कहा और उसे वही पार्क में छोड़कर घर आ गया।

उस दिन के बाद मेरे सीने में दर्द कुछ ज्यादा ही रहने लगा था, और उस दर्द को आराम देने के लिए मैं दो-चार घुंट चढ़ा लिया करता था। दो-चार के बाद धीरे-धीरे 5 -10 हो गया, फिर वो 5 - 10 घुंट 10 - 20 फिर पुरी बोतल, बोतल के बाद भी अब मुझे कही चैन नहीं मिला करता था। युँ ही वक्त धीरे-धीरे सप्ताह सप्ताह से महीना महीने से दो महीना का लम्बा कट गया और उन्ही दो महीनो में मुझे न जाने कब कैंसर ने आ जकड़ा । उपर वाले, का शुक्रिया किया की चलो बेमतलब जिंदगी को किनारा लगाने का बहाना तो मिल गया, लेकिन जब मुझे ये ख्याल आया की मेरी लाश का क्या होगा तो थोड़ा गमगीन हो गया था, पर मैंने अपना माथा पिटा और खुद को ही डाँटता सा समझाने लगा - बेवकुफ जिंदगी की तलाश में दर-बदर भटकता रहा तो इतनी फिकर नहीं की, और अब अपनी लाश की इतनी फिकर हो रही है।

एक रात जब मैं अपने ऑफिश से निकला तो एक दोस्त मिल गया जिसने मुझ से पिने का आग्रह किया, मैंने भी उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कह चल पड़ा की- कोई हम दम ना मिला जिंदगी में तो जीना क्युँ छोड़ दूँ? हमसफर मिले तुम राहे मयखाने तो पीना क्युँ छोड़ दूँ?

नशे की धुन में रात को लड़खड़ाता हुआ मैं तकरीबन 11 बजे घर आया था, मैंने दरवाजा खटखटाया तो दरवाजा खुलता चला गया। नशे में भी मुझे कुछ अजीब सा लगा, मेरे दिल ने मुझ से कहा शायद तुम्हारा इंतजार कर रही होगी गायत्री? हुँ इंतजार- मुँह बनाता हुआ मैं अंदर दाखिल हुआ, तो गायत्री इंतजार में ही बैठी थी। मै चुप चाप अंदर दाखिल हुआ और एक बेग में कपड़े रखा, अपनी डायरी उठाई और चल पड़ाI तब तक गायत्री मेरी आगे आकर खड़ी हो गई और कहने लगी रात को कहाँ जा रहे हो खाना खाओ और सो जाओ कल सुबह जहाँ जाना हो वहाँ चले जाना। खाना खाओ, अब मैं इस घर में खाना तो क्या, एक पल ठहर भी नहीं सकता मुझे जाने दे- अपने सामने से उसे हटाते हुए मैं घर से बाहर निकल गया और चल पड़ा एक अनजाने मंजिल की ओर।

मुझे ऐसा महसुश हुआ शायद गायत्री दरवाजे पर खड़ी मेरी ओर देखे जा रही थी, शायद वो मेरे पलट कर उसे देखने को सोच रही थी।- पर वो जानती थी, की जब मैं एक कदम उठा लिया तो न वापस नहीं आता हुँ नहीं पलट कर देखता हुँ, फिर भी वो इस इंतजार में दरवाजे पर क्युँ खडी रही? मेरे दिल दिमाग में कोई उत्तर नहीं सुझा। छोड़ यार उसकी मर्जी जो करे, तु अपना रास्ता देखकर चल, कही फिर ठेस न लग जाए - मैंने अपने आप को समझाया और चलता रहा। रात को बस स्टैण्ड आया और दिल्ली की बस पकड़ा I

दिल्ली पहुँच कर बस स्टैण्ड पर ही मैं सुबह का इंतजार करने लगा। मेरा इंतजार बस कुछ घण्टो में ही ख़त्म हो गया। सुबह होते ही मैं दिल्ली में रहे रहे करीबी को तलाशने का फैसला किया पर मैं किसी वजह से नकाम रहा। मैंने वही एक कमरा किराया पर लिया, रोजभरी की चीजे खरीद लाया और एक नौकरी की तलाश करने लगा। एक दिन मुझे एक फ़र्मा कम्पनी में एक स्टोर इंचार्ज की नौकरी मिल गई, मैं ज्यादा खुश इस बात से हुआ की चलो जीने के साथ पिने का भी जरिया मिल गया।



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