सिमा पर सीना
तान खड़े थे
अकेले,
याद आई
ना तुम्हारे बलिदान की
जब तक,
गुमाने-ए-हिन्द रहा करते
है हम,
फक्र है दुश्मन
भी परेशां है
अब तक।
आई बहार-ए-हिन्द चमन में
तुमसे,
जहाँ भी इल्तिफ़ात-ए-इश्तियाक़ है,
आफताब-ए-हिन्द
हुआ जहाँ का,
फ़क्र हिन्द पर है तुम्हारे करम से।
जहाँ में ऐसी हिन्द की भूमि है एक,
उरूज़ देश भक्ति
इरादे है नेक,
माँ
भारती के लाल
तुम आगे बढ़ो,
सिंह को क्या
रोके श्वान कुछ
एक।