औरत तुम कुछ तो कहो......!
आईं भ्रूण में तो जाँची जाती,
कन्या है तो बिचलित करती,
पहला गर्भ लोक लाज में बचे,
अन्यथा अक्सर मारी ही जाती,
चिंता पूर्ण उदर में पलती,
काश बेटा होता तुम परिहार्य हो। औरत तुम कुछ तो कहो....!
जन्म लेते मन रुदन करता,
तेरे भाग्य का कौन करता धर्ता,
पोसे ऐसे मरता क्या करता,
अवहेलनाओं का बोझ उठाय,
सामाजिक रीती के भीति,
जग में तुम असहाय हो। औरत तुम कुछ तो कहो....!
भई सयानी हुई बेगानी ,
अपनों में बढ़े निराशा ,
परायों की पड़े जो नजरें बेईमानी,
लगन कराने को माई चिंतित,
योग्य वर ढूंढ़ थके बाबा,
सहोदर की तो तुम पराई हो। औरत तुम कुछ तो कहो....!
नए रिश्ते की सहनाईं में,
खूब नाचे दहेज़ के लोभी,
जीवन संगी बनेगा जो,
वो भी है उनका सम्बन्धी,
डोली उठी छूटा आँगन,
गुम गई जैसे कोई दूसरी दुनियां बनाई हो। औरत तुम कुछ तो कहो....!
औरत तुम कुछ तो कहो....!