रमेश जब अतीत की धुंधली तस्वीरों पर जमी धूल साफ़ करता है, तो उसके सामने बिखर जाती है उसकी और गायत्री की वो अधूरी प्रेम कहानी, जिसे समाज की बंदिशों और लालच की शर्तों ने जीते-जी नरक बना दिया था। छपरा के गाँव की पृष्ठभूमि पर लिखी गई, भोजपुरी के मीठे पुट और गहरे सस्पेंस से भरपूर एक ऐसी भावुक दास्तां, जो आपकी आँखों में आँसू ला देगी।"
दोपहर की ढलती धूप में कुएं पर एक 50 -55 साल की महिला पानी भरने के लिए बाल्टी और लेकर अभी अभी आई ही थी तभी हुलिए से लगभग वृद्ध एक आदमी वहाँ आता है और सामने कुएं से पानी निकाल रही उस औरत को संबोधित करते हुए कहता है।
लीला कुएं में लटके हुए बाल्टी की डोर को पकड़े हुए ही अजनबी की तरफ मुड़ती है वह अपनी आँखों पर हाथ का साया बनाकर उसे गौर से देखती है। बृद्ध के कंधे पर एक पुराना थैला था आँखों पर मोटा चश्मा, पुराने कपड़ो में, बड़ी हुई दाढ़ी मूंछ, पैरो में हवाई चप्पल और एक पुराने गमछा लिए खड़ा उसे ही देखा जा रहा था।
वृद्ध के चेहरे पर एक दर्दभरी मुस्कान तैर जाती है, वह भारी आवाज में कहता है, "हम जानत रही लीला जी की रउवा हमके ना पहचान पाईब, अब त हमनी के बूढ़ हो गईनी जा आँखों मोटा गईल होइ अउर मिलतो त बहुत दिन बाद बानी जा।
अनजान वृद्ध की इन रहस्यमयी बातों से लीला विस्मित हो उठती है, वह आश्चर्य भरी नजरों से देखती हुई उसके और पास आती है।
लीला लगभग भागती हुई रमेश के और करीब आती है। वह कांपते हाथों से रमेश का हाथ पकड़ लेती है और उसे अपने घर के बरामदे की तरफ खींचती हुई ले जाती है।
रमेश बोझिल कदमों से लीला के साथ चल पड़ता है।
दृश्य: लीला के घर का बैठका में एक कोने में कुछ पुरानी, मगर बहुत करीने से सजाकर रखी हुई कुर्सियाँ पड़ी हैं। लीला रमेश को एक कुर्सी खिंच कर देती हुई कहती है।
लीला: "बइठअ रमेश। हम अबहीं चाय पानी लेके आवत बानी तू बहुत दूर से आवत बाड़अ इ आपन का हाल बना लेले बाड़अ ?"
इतना कहकर लीला रसोई की तरफ चली जाती है। रसोई में जाकर वह चाय बनाने का सामान इकट्ठा करने लगती है, तभी उसे ध्यान आता है कि घर में दूध तो खत्म है। वह दूध लेने के लिए बाहर चली जाती है।
इधर बैठक में बैठा रमेश अपनी कुर्सी से उठता है। वह अपने चश्मे को ठीक करते हुए सामने दीवार पर टंगी तस्वीरों को गौर से देखने और पहचानने की कोशिश करता है। तभी उसकी नजर एक तस्वीर पर पड़ती है, जिसमें गायत्री और लीला दोनों एक साथ खड़ी हैं। रमेश उस फोटो फ्रेम को दीवार से उतारता है और अपने कंधे पर रखे गमछे से उसे धीरे-धीरे साफ करने लगता है।
उस फोटो को देखते ही रमेश की आँखों के सामने अपनी और लीला (तथा गायत्री) की वो आखिरी मुलाकात के दिन तैरने लगते हैं। वह वहीं खड़ा-खड़ा यादों के समंदर में खो जाता है।
फ्लैशबैक (अतीत की यादें):
दृश्य: सालों पहले का रमेश का घर।
यह रमेश की जवानी के वो दिन थे जब उसने अभी-अभी कॉलेज की पढ़ाई पूरी की थी। आँखों में बड़े-बड़े सपने, चेहरे पर गजब का तेज और दिल में कुछ कर गुजरने का जज्बा साफ दिखता था। कंधे तक छँटे बाल, सलीके से संवारी गई मूंछें और सूती शर्ट-पायजामे में रमेश बेहद सजीला और होनहार नौजवान लगता था।
उन दिनों उसका घर खपरैल मगर ईंटो से बना एक बड़ा सा पारंपरिक मकान था, जिसके आंगन में हमेशा चहल-पहल रहती थी। ओसारे में बंधी गाय की आवाज और रसोई से आती सोंधी खुशबू घर को जीवंत बनाती थी। रमेश कॉलेज से निकलने के बाद लगातार नौकरियों के तलाश में था, उसके पिता जी (रामदयाल ) उसे चंडीगढ़ अपनी बड़ी बेटी (संगीता) के पति रमेश का बहनोई के पास नौकरी करने के लिए भेज रहे थे
घर के आँगन में बैठा रमेश आज बेहद हड़बड़ी में जल्दी-जल्दी खाना खा रहा है, मानो उसे कहीं पहुंचने की बहुत जल्दी हो। उसकी भाभी चूल्हे के पास बैठी रोटियां सेंक रही हैं। रमेश को इस तरह बिना चबाए खाते देख, वे अपनी साड़ी के पल्लू से मुंह ढककर हंसती हैं और उसे छेड़ते हुए कहती हैं।
भाभी: "अरे रे रे रे! अरे, इ तू का कर रहल बाड़अ बबुआ ? आराम से खा! कौनो गाड़ी छूट जाई का? आ फिर तोहार गीतूआ कहीं भाग जाई?"
रमेश जल्दी-जल्दी मुंह चलाता हुआ शर्मा जाता है, पर अपनी खुशी छुपा नहीं पाता। वह उत्साह से भरकर कहता है।
रमेश: "भाभी, तू ना जानबू! हमके जल्दी से पहुंच के पहले गीतू के बतावे के बा की हम नौकरी करे जात बानी। जब हमरा के नौकरी मिल जाई, तब हम गीतू से एही साल में शादी कर लेब!"
भाभी (मुस्कुराते हुए): "इ राज तोहार जल्दी-जल्दी खाना खाए के हम त जानते नु बानी।"
रमेश भाभी की बात सुनकर झेंप जाता है। वह झटपट हाथ धोकर अपनी पुरानी मगर चमचमाती साइकिल निकालता है। दिल में उमंगों का सैलाब और आँखों में गायत्री का चेहरा लिए वह अपनी मंजिल की ओर चल पड़ता है। नवम्बर के दोपहर की खिली धूप में हवाएं भी जैसे उसके कानों में शहनाइयाँ बजा रही थीं। रास्ते के हर बाजार और चौक से गुजरते हुए रमेश मस्ती में पैडल मारा जा रहा था।
गायत्री के गाँव से करीब दो किलोमीटर पहले 'मनैनी' नाम का एक छोटा सा बाजार रमेश वहाँ एक हलवाई की दुकान पर रुकता है। खुशबूदार गरम-गरम तजा खुरमा मिठाइयों का एक डिब्बा बंधवाकर वह साइकिल के कैरियर पर दबाता है। अब उसका दिल और तेजी से धड़कने लगा था। हमेशा मुस्कुराने वाला रमेश जब गायत्री के गाँव जाने वाली कच्ची सड़क पर मुड़ता है तो खुद को रोक नहीं पाता। वह पूरे धुन में, ऊँची और सुरीली आवाज में गाने लगता है—
"आपके करीब हम रहते हैं... अपना नसीब तुम्हें कहते हैं...!"
साइकिल के पहियों की गूंज और रमेश की आवाज मिलकर गाँव की पगडंडी को जीवंत कर देती हैं। गाते-झूमते हुए रमेश जैसे ही गायत्री के गाँव की सरहद पर स्थित एक घने आम के बगीचे के पास पहुँचता है, उसकी नजर राजू पर पड़ती है। राजू, जो गायत्री का 7 साल का छोटा भाई है, हाथ में पानी का जग लिए जा रहा था। रमेश को देखते ही उसका चेहरा खिल उठता है।
राजू: "नमस्ते रमेश पाहून !"
रमेश तुरंत साइकिल से उतरता है। वह घुटने के बल जमीन पर बैठ जाता है, राजू को बांहों में भरकर उसके गाल पर प्यार से एक पप्पी लेता है।
रमेश: "नमस्ते राजू! कहाँ जात बाड़अ बाबू? घर में के-के बा?"
राजू (मासूमियत से): "दादी आ गीतू दीदी घरें बाड़ी। माई-बाबूजी खेत में काम कर रहल बानी, हम उनके खातिर पानी लेके जात बानी।"
रमेश (मुस्कुराते हुए राजू के बाल संवारता है): "अच्छा ठीक बा, तू जल्दी से पानी पहुँचा के आवअ।"
तभी रमेश अपनी शर्ट की जेब में हाथ डालता है और बड़े जतन से रखी एक मखमली चॉकलेट निकालकर राजू के हाथ पर रख देता है। उन दिनों गाँव में चॉकलेट किसी मिठाई जैसी कीमती होती थी। राजू की आँखें खुशी से बड़ी हो जाती हैं। वह चॉकलेट लेकर खेत की तरफ दौड़ पड़ता है।
रमेश के दिल की धड़कन अब बेकाबू हो रही थी। वह अपनी साइकिल पर दोबारा सवार होता है और सीधे गायत्री के बथान के सामने जाकर रुकता है। साइकिल को नीम के पेड़ के सहारे खड़ा कर, वह फार्म हाउस के उस अधखुले, पुराने लकड़ी के गेट को हौसले और थोड़े संकोच के साथ ढकेलता है।
अंदर दाखिल होते ही, चारों तरफ फैली हरियाली और फूलों की महक के बीच रमेश अपनी मखमली आवाज में गुनगुनाता है—
"कैसे मिजाज आपके हैं, जरा फरमाइए...!"
उसकी आवाज अभी हवा में तैर ही रही होती है कि सामने ओसारे की ओट से एक बेहद खनकती, अनजानी और सुरीली आवाज पलटकर जवाब देती है—
"हम तो हैं खैरियत से, अपना सुनाइए...!"
रमेश उस सुरीली आवाज की दिशा में कदम बढ़ाता है, जो सामने लगे विशाल कदम के पेड़ की ओट से आ रही थी। कदम के पत्तों की सरसराहट के बीच वह कौतूहल से आँखें गड़ाकर देखता है, पर वहाँ कोई दिखाई नहीं देता। वह जैसे ही पेड़ के दाईं तरफ घूमता है, पीछे से दबी-छुपी हँसी की आवाज आती है। दरअसल, वह गाना लीला (लीलावती गायत्री की फुफेरी बहन) गा रही थी और दोनों सहेलियाँ—गायत्री और लीला—कदम के तने के पीछे छुपी हुई थीं।
जैसे ही रमेश पेड़ के चक्कर काटता, दोनों लड़कियाँ दबे पाँव गोल-गोल घूमकर उसकी नजरों से बच जातीं। दो-तीन चक्कर काटने के बाद रमेश समझ जाता है कि कोई उसके साथ मीठी शरारत कर रहा है। वह अचानक एक जगह ठहर जाता है। रमेश को थमा देख गायत्री का ध्यान भटकता है और वह पकड़ी जाती है।
रमेश को सामने खड़ा देख गायत्री लाज और घबराहट से वहाँ से भागने के लिए लीला की तरफ इस कदर मुड़ती है कि उसकी खुली हुई रेशमी जुल्फों का एक झोंका सीधे रमेश के चेहरे पर आकर लगता है। उस छुअन से रमेश के दिल की धड़कन जैसे एक पल के लिए थम जाती है।
शर्म से लाल हुई गायत्री आगे-आगे और लीला हंसती हुई उसके पीछे-पीछे भागने लगती है। रमेश भी अपनी सुध-बुध खोकर मुस्कुराते हुए उनके पीछे दौड़ पड़ता है। भागते-भागते हवा में उड़ता हुआ लीला का दुपट्टा अचानक रमेश के हाथ में आ जाता है। दुपट्टा खिंचते ही लीला की रफ्तार थम जाती है। वह हाँफते हुए गायत्री को आवाज लगाती है—
लीला: "अरे रुक जा गीतू! हम त फँस गैनी! अब तू रुक जा, वरना पता ना हमरा साथ में का हो जाई!"
गायत्री दौड़ते-दौड़ते पीछे मुड़कर देखती है। लीला वहीं हरी घास पर बैठकर अपनी उखड़ी हुई साँसें ठीक करने की कोशिश कर रही थी और रमेश हाथ में दुपट्टा लिए मुस्कुरा रहा था। गायत्री दौड़कर वापस आती है और रमेश को लीला से मिलवाते हुए कहती है कि यह उसकी सबसे पक्की सहेली है।
लीला को थोड़ा दूर देखकर, गायत्री दुनिया जहान की परवाह किए बिना रमेश के और करीब आती है। वह अपने कोमल हाथों को रमेश के गले में डाल देती है। उसकी आँखों में प्यार और इतने दिनों का इंतजार साफ दिख रहा था। वह थोड़े शिकायती और बेहद जादुई लहजे में कहती है—
गायत्री (गीतू): "रमेश... तू इतने दिन से कहाँ रहलअ? अब तोहके हमार याद आइल बा?"
रामू (गायत्री की आँखों में झांकते हुए): "अरे ना पगली! अइसन कइसे सोच लिहलू? तोहार याद में ही त हमार सांस चलत बा।"
दोनों एक-दूसरे की आँखों में खोए ही थे कि तभी लीला मुस्कुराती हुई उनके बीच में बोल पड़ती है।
लीला: "अरे गीतुआ! तू रामू के अइसे खड़े-खड़े ही सब पूछ लेबू का? अरे, इनका के बैठाव, कुछ पानी-वानी पीये के द यार! दूर से आइल बाड़न, थक गईल होइहें।"
लीला की बात सुनकर गायत्री झेंप जाती है। वह रामू का हाथ थामते हुए कहती है, "हाँ-हाँ चलअ, बैठ के बात कइल जाई।"
कदम के घने पेड़ के नीचे एक पक्का चबूतरा बना हुआ था, जहाँ ठंडी छांव बिखरी थी। तीनों वहाँ जाकर बैठ जाते हैं। गायत्री रामू और लीला को वहाँ बैठाकर खुद दौड़कर पानी लेने चली जाती है। इस बीच, रामू और लीला एक-दूसरे का हाल-चाल पूछते हैं और बातें करते हैं। कुछ ही देर में गायत्री पानी का जग और एक पीतल की प्लेट में कुछ घरेलू पकवान लेकर आती है। तीनों मिलकर ठंढा पानी पीते हैं और थोड़ा सा जलपान करते हैं।
अब रामू का उत्साह दोबारा लौट आता है। वह बड़ी उत्सुकता से गायत्री का हाथ थामकर कहता है, "गीतू, हमार नौकरी लग गईल बा! हम अब कमाए खातिर बाहर जात बानी।"
यह खबर सुनकर जहाँ गायत्री को खुश होना चाहिए था, वहीं उसके चेहरे पर एक गहरा सन्नाटा छा जाता है। जुदाई के डर से वह मायूस हो जाती है। उसकी आँखें भर आती हैं और वह रामू के मजबूत कंधे पर अपना सर रखकर धीरे-धीरे सुबकने लगती है। रामू परेशान होकर उसके आंसू पोंछता है।
गायत्री (रोते हुए): "रामू... तू जानत बाड़ू लीला यहाँ पर काहें आइल बाड़ी?"
रामू (अचंभित होकर): "काहे?"
गायत्री (लीला की तरफ देखते हुए): "लीला कलकत्ता में अपना एक सहपाठी संतोष नाम के लड़का से प्यार करेली। इनकर बाबूजी इ नइखन चाहत की लीला के शादी ओह लड़का से हो सके। येही वजह से लीला के जबरदस्ती यहाँ गाँव भेज देले बाड़न।"
गायत्री के मुंह से अपनी छिपी हुई दास्तान सुनकर लीला के चेहरे पर उदासी का एक और गहरा साया छा जाता है। वह अपनी आँखें नीची कर लेती है। रामू की निगाहें जब लीला पर पड़ती हैं, तो वह देखता है कि लीला शून्य में ताकती हुई, सामने धूल में खेल रहे छोटे-छोटे बच्चों को एकटक देख रही है। मानो वह अपने बिखरते हुए सपनों को देख रही हो।
लीला की यह बेबसी देखकर रामू का दिल कांप उठता है। उसे लगता है कि कहीं कल को उसके और गायत्री के साथ भी ऐसा ही न हो जाए। रामू को अपने पिता जी का वो कड़क और सख्त मिजाज याद आने लगता है, जो समाज और मर्यादा के सामने कभी किसी की नहीं सुनते थे।
फ्लैशबैक (अतीत की यादें):
दृश्य: रामू के घर का आँगन।
धूप आँगन में पसरी हुई है। रामू के पिता जी, जो पूरे खानदान में अपने ऊँचे रसूख और कड़क स्वभाव के लिए जाने जाते हैं, अपने छोटे भाई (रामू के चाचा जी) के साथ आँगन में खटिया पर बैठे हैं। दोनों हुक्का गुड़गुड़ाते हुए किसी गंभीर विषय पर बात कर रहे हैं। पिता जी के चेहरे के कड़े भाव देखकर ही लग रहा है कि उनके सामने किसी की मर्जी की कोई बिसात नहीं है।
दीनदयाल (चाचा जी - हाथ जोड़ते हुए): "भैया! दोनों के खुशी के बारे में सोचअ तनीका। दुनो मासूम बाड़न, एक-दूसरे के साथ बहुत खुश रहिहें। दुनो के शादी कर द।"
रामदयाल जी (पिता जी) की आँखें गुस्से से लाल हो जाती हैं। वे हुक्के की नली को एक तरफ झटकते हुए कड़क आवाज में बोलते हैं।
रामदयाल (पिता जी): "अरे! तू का पागल हो गईल बाड़अ का? हमार सारा पैसा पानी में डाल देबे के चाहत बाड़अ? अरे भाई, हम इतना पैसा खर्च करके अपना लड़का के पढ़वनी, आ फ्री में शादी कर दीं? ना भाई ना! कम से कम डेढ़ लाख रुपिया (1.5 लाख) दहेज में लेवे के बा हो! साथ में हमरो भी एगो लड़की बिया, ओकर भी त शादी करे के बा। हमरो भी त आगे चलके केहू के दहेज देवे के पड़ी!"
पिता जी की यह कड़वी और लालची बातें जैसे रामू के भविष्य पर मौत का वार कर देती हैं।
दृश्य (बदलता है): इसके बाद अतीत का सबसे स्याह और दर्दनाक पन्ना उभरता है। मंडप सजा है, शहनाइयाँ बज रही हैं, लेकिन यह गायत्री की शादी का मंडप है, जहाँ उसका दूल्हा कोई और है। रामू इस जुदाई के गम को सह नहीं पाता। वह जिंदगी में पहली बार बेतहाशा शराब पी लेता है। लड़खड़ाते कदमों से वह सीधे गायत्री की शादी के मंडप में पहुँचता है और वहीं बेसुध होकर जमीन पर गिर पड़ता है।
अपनी जिंदगी को इस हाल में देख गायत्री लाज-शर्म और दुनिया की परवाह छोड़ चीख पड़ती है। वह मंडप से दौड़ती हुई रामू के पास आती है। वह घुटनों के बल बैठकर रामू का सिर अपनी गोद में लेती है और रोते हुए उसे झकझोरने लगती है, "रामू... रामू... आँखें खोलो रामू!"
"रामू... रामू..." की वह दर्द और संशय से भरी हुई आवाज रामू के कानों में लगातार गूँजती रहती है।
इसी गूँज के साथ अचानक रामू का ध्यान टूटता है। उसकी आँखों के सामने से अतीत का वह धुंधला और आंसुओं से भरा मंजर गायब हो जाता है। उसे होश आता है कि वह तो आज सालों बाद अपनी उसी पुरानी सहेली लीला जी के ड्राइंग रूम में खड़ा है। वह न जाने कब से हाथों में लीला और गायत्री की वही पुरानी धुंधली तस्वीर लिए यादों के बवंडर में खोया हुआ था।
लीला न जाने कब से हाथ में गरम चाय का प्याला लिए रामू को आवाजें लगा रही थी। रामू अपने ख्यालों की दुनिया से पूरी तरह बाहर तब आता है, जब लीला पास आकर उसके कांपते कंधों को पकड़कर हिला देती है।
लीला (फिक्र से डूबती आवाज में): "रामू... अरे कहाँ खो गईल बाड़अ? हम जरा पास के ही एक घर से दूध लेवे के खातिर चल गइल रहनी, हमके थोड़ा देर हो गईल। बाकी तू कहाँ खो गईल रहलअ? कब से हम तोहके चाय लेके आवाज लगावत रहनी, तू कुछ सुनबे नहीं करत बाड़अ!"
चाय की प्याली से उठता हुआ धुआँ और लीला की फिक्रमंद आँखें रामू को वर्तमान की कड़वी हकीकत का अहसास करा देती हैं।
लीला के इन सीधे सवालों से रमेश का भीतर तक टूट चुका दिल और व्यथित हो उठता है। वह खुद को संभालते हुए तस्वीर को वापस मेज पर रखता है और बहुत ही भावुक नजरों से लीला की तरफ देखता है।
रामू (रमेश - भारी आवाज में ): "लीला... तू त गायत्री के सबसे करीब रहलू। तोहरा से का छुपल बा? तोहरा त सब पता होखे के चाहीं की हमरा और गायत्री के जिंदगी में का-का भइल! बाकी छोड़अ उ सब... पहले तू बताव, तू अपना संतोष के साथ खुश बारू न? हमारी गीतू की सबसे प्यारी सहेली खुश त बिया न?"
रमेश का यह सवाल सुनकर लीला की आँखों में एक पुराना दर्द तैर जाता है। वह एक पल के लिए रुआंसी हो जाती है, लेकिन अपनी कहानी बताने से पहले वह रमेश की बातों का जवाब देती है और रमेश-गायत्री के बीते दिनों को याद करने लगती है।
लीला (एक ठंडी सांस लेकर): "हाँ रामू, हम संतोष के साथ ठीक बानी, कलकत्ता छोड़ के गाँव-घर में रहे के पड़ल, संघर्ष बहुत रहे बाकी उ हमके खुश रखलें। बाकी हमार बात छोड़अ...हम तोहरा और गीतू के बारे में सोचत बानी। हम याद करत बानी उ दिन जब तू साइकिल से गीतू के फार्म हाउस पर रहलअ। हम त ओही कदम के पेड़ के पीछे छुप के तोहार सजल जवानी और गीतू के चेहरे की उ लाली देखले रहीं। ओही दिन हम जान गईल रहीं की तू दोनों एक-दूसरे के बिना जी नहीं पइब।"
लीला की आँखें आंसुओं से धुंधली हो जाती हैं, वह रमेश के चेहरे पर छाए सन्नाटे को देखकर अपनी बात आगे बढ़ाती है।
लीला (बेहद दुखी आवाज में): "लेकिन किस्मत के मंजूर कुछ और रहे। कुछ-कुछ बात, केहू-केहू से थोड़ा-मोड़ा सुने के मिलल रहे की तोहार बाबूजी के जिद के आगे तोहार प्यार हार गइल। बाकी हम आज तोहरा मुँह से सब कुछ सुने के चाहत बानी। हमार गीतूआ के जिंदगी त शादी के बाद बिल्कुल नरक हो गइल रहे! बाकी तोहरा बारे में त गीतूओ के कुछ ना पता चलल की तू कहाँ बाड़अ आ कइसन बाड़अ। एक-दो बार बात भइल रहे गीतू से, त उहो तोहरा बारे में जयादा कुछ ना बता पइली। सच त इ बा की उ तोहरा बारे में ज्यादा बात भी कहाँ कर पावत रही... काहे से की ओकरा ससुराल में ओकरा पर ओह टाइम बहुत पाबंदी लागल रहे। उ लोग ओकरा के एकदम बांध के रखले रहन।"
गायत्री की जिंदगी के इस नरक और उस पर लगी पाबंदियों की बात सुनकर रमेश के सीने में जैसे कोई खंजर उतर जाता है। कमरे में एक भारी सन्नाटा पसर जाता है।
लीला भी रमेश के पास ही रखे एक छोटे से मेज पर बैठ जाती है। वह शून्य में ताकते हुए भारी आवाज में कहती है,
लीला (एक दर्दभरी आह के साथ) "लेकिन माँ-बाप के घर से निकल के के खुश रह सकता रमेश?"
अपनी आपबीती सुनाने से पहले लीला का गला रुंध जाता है। वह बेहद रुआंसी हो जाती है और उसकी आँखों से आंसुओं की धार बह निकलती है। वह जल्दी से अपने आंचल के कोने से आँखों के पानी को साफ करने लगती है, ताकि रमेश को उसकी आंसु न दिखे।
लीला के इस छुपे हुए दर्द और हालातों से रमेश अब तक पूरी तरह अनजान था। लीला को इस तरह बिखरते देख रमेश को कुछ अटपटा सा लगता है। उसके दिल में एक अजीब सी बेचैनी होने लगती है और वह खुद को रोक नहीं पाता। वह फिक्रमंद होकर पूछ ही बैठता है।
रमेश: "का बात बा लीला जी? लागत बा की कौनो बड़ी मुश्किल में बानी रउवा? का रउवा आपन शादी से खुश नईखी का?"
रमेश का यह सवाल सुनकर लीला झटके से अपनी आँखें पोछती है और बात संभालते हुए कहती है।
लीला: "ना रमेश, अइसन कौनो बात नइखे। हम अपना शादी से बहुत खुश बानी। संतोष हमके बहुत मानेलन। बात दरअसल इ बा की जब हम गायत्री के घर में रहनी और तू अपना रोजी-रोटी के खातिर परदेश चल गइल रहलअ... ओही साल दशहरा के मेला से हम गायत्री के मेला में अकेले छोड़ के सीधे सिताब दियारा, छपरा आ गइल रहनी। यहाँ आके हम संतोष के साथ कोर्ट मैरिज कर लेले रहनी। ओकरा बाद से त हमार माई-बाबूजी हमके अपना घर की चौखट पर कभी पैर ना रखने के हिदायत दे देले रहलन। उ लोग हमके हमेशा के लिए भुला देलन।"
लीला एक पल के लिए रुकती है, जैसे बीते समय की यादें उसके सीने पर भारी पड़ रही हों। वह रमेश की तरफ देखती है और कहती है, "इ सब तोहरा परदेश जाए के ठीक एक महीना बाद भइल रहे रमेश..."
फ्लैशबैक (अतीत की यादें):
दृश्य: लीला अपनी नजरें झुका लेती है और रमेश के साथ हुई उस पुरानी मुलाकात के बाद के दिनों की दास्तान बयां करने लगती है।लीला (एक दर्दभरी मुस्कान के साथ): "हाँ रमेश, हाँ... खुश त बानी।"
इतना कहकर लीला भी रमेश के पास ही रखे एक छोटे से मेज पर बैठ जाती है। वह शून्य में ताकते हुए भारी आवाज में कहती है, "लेकिन माँ-बाप के घर से निकल के के खुश रह सकता रमेश?"
अपनी आपबीती सुनाते-सुनाते लीला का गला रुंध जाता है। वह बेहद रुआंसी हो जाती है और उसकी आँखों से आंसुओं की धार बह निकलती है। वह जल्दी से अपने आंचल के कोने से आँखों के पानी को साफ करने लगती है, ताकि रमेश को उसकी कमजोरी न दिखे।
लीला के इस छुपे हुए दर्द और हालातों से रमेश अब तक पूरी तरह अनजान था। लीला को इस तरह बिखरते देख रमेश को कुछ अटपटा सा लगता है। उसके दिल में एक अजीब सी बेचैनी होने लगती है और वह खुद को रोक नहीं पाता। वह फिक्रमंद होकर पूछ ही बैठता है।
रमेश: "का बात बा लीला जी? लागत बा की कौनो बड़ी मुश्किल में बानी रउवा? का रउवा आपन शादी से खुश नईखी का?"
रमेश का यह सवाल सुनकर लीला झटके से अपनी आँखें पोछती है और बात संभालते हुए कहती है।
लीला: "ना रमेश, अइसन कौनो बात नइखे। हम अपना शादी से बहुत खुश बानी। संतोष हमके बहुत मानेलन। बात दरअसल इ बा की जब हम गायत्री के घर में रहनी और तू अपना रोजी-रोटी के खातिर परदेश चल गइल रहलअ... ओही साल दशहरा के मेला से हम गायत्री के मेला में अकेले छोड़ के सीधे सिताब दियारा, छपरा आ गइल रहनी। यहाँ आके हम संतोष के साथ कोर्ट मैरिज कर लेले रहनी। ओकरा बाद से त हमार माई-बाबूजी हमके अपना घर की चौखट पर कभी पैर ना रखने के हिदायत दे देले रहलन। उ लोग हमके हमेशा के लिए भुला देलन।"
लीला एक पल के लिए रुकती है, जैसे बीते समय की यादें उसके सीने पर भारी पड़ रही हों। वह रमेश की तरफ देखती है और कहती है, "इ सब तोहरा परदेश जाए के ठीक एक महीना बाद भइल रहे रमेश... बाकी आगे..."
फ्लैशबैक (अतीत की यादें):
दृश्य: लीला अपनी नजरें झुका लेती है और रमेश के साथ हुई उस पुरानी मुलाकात के बाद के दिनों की दास्तान बयां करने लगती है।
दृश्य: (फ्लैशबैक) गायत्री के घर का दालान। दोपहर का समय था।
तभी बाहर से डाकिया आवाज लगाता है और कलकत्ता से आया एक खत (चिट्ठी) ओसारे में थमाकर चला जाता है। वह चिट्ठी गायत्री के पिता जी के नाम थी, जो लीला के पिता (गायत्री के फूफा जी) ने भेजी थी। दादी माँ खत लेकर आँगन में आती हैं। कलकत्ता का नाम देखकर वह उत्सुक हो जाती हैं और गायत्री को पास बुलाती हैं।
दादी माँ: "गीतू! जरा देख त बाबू, तोहार फूफा जी कलकत्ता से चिट्ठी भेजले बाड़न। बाबूजी (राधे मोहन) अभी खेत पर बाड़न, तू जरा इसे खोल के पढ़ त, का लिखले बाड़न?"
गायत्री अपनी दादी के कहने पर खत का लिफाफा खोलती है और उसे पढ़ना शुरू करती है। वह जैसे ही पहली दो लाइनें पढ़ती है, उसका दिल धक से रह जाता है। चिट्ठी में लिखा था कि लीला की मंगनी के लिए लड़के वाले जल्द ही गाँव आ रहे हैं। गायत्री चिट्ठी दादी के हाथो में पकड़ा झटपट अंदर कमरे में जाती है, जहाँ लीला बैठी थी। गायत्री बेहद घबराई हुई आवाज में लीला को बस इतना बताती है कि कलकत्ता से फूफा जी की चिट्ठी आई है।
तभी गायत्री के पिता राधे मोहन जी खेत से लौटकर आँगन में आते हैं और हाथ-पैर धोने लगते हैं। दादी माँ वह चिट्ठी तुरंत राधे मोहन जी के हाथ में थमा देती हैं।
कमरे के दरवाजे की ओट में छुपी लीला और गायत्री सांसें रोके खड़ी थीं। लीला का दिल तेजी से धड़क रहा था, वह जानने के लिए बेताब थी कि चिट्ठी में क्या लिखा है। लेकिन राधे मोहन जी चिट्ठी को गंभीर चेहरे के साथ बिल्कुल चुपचाप, मन ही मन खत की पंक्तियाँ पढ़ने लगते हैं।
चिट्ठी पढ़ते हुए राधे मोहन जी के चेहरे के कड़े भाव बदलते जा रहे थे, लेकिन उनके मुंह से एक शब्द भी नहीं निकल रहा था। लीला दरवाजे के पीछे खड़ी होकर उनके चेहरे को देख रही थी। वह डर और सस्पेंस से पूरी तरह घबरा जाती है। चिट्ठी में क्या लिखा है, यह न जान पाने की बेबसी उसे भीतर ही भीतर डराने लगती है। उसे शक होने लगता है कि कलकत्ता में संतोष और उसके रिश्ते को लेकर कुछ बड़ा होने वाला है।
लीला की आँखों में बहते हुए आँसू देखकर गायत्री का दिल पसीज जाता है। वह उसे हौसला देने के लिए अपने सीने से लगा लेती है और रोती हुई लीला को संभालते हुए अपने बेडरूम में ले जाती है। वह लीला के आँसू पोंछती है और ढाढस बंधाते हुए कहती है।
गायत्री: "तू चुप हो जा लीलावती! ऐसन कुछ न होई जेकरा से तोहार साथ-साथ केहू और के भी जिंदगी बर्बाद हो जाए। हम तोहार साधे/साथे बानी न...तू हिम्मत मत हार"
लीला अभी भी बुरी तरह कांप रही थी। वह सुबकते हुए गायत्री की तरफ देखती है और अपनी बेबसी बयां करती है।
लीला (रोते हुए): "हाँ गीतू... हम पहले ही से जानत रहनी की हमार बाबूजी हमार बात कभी ना मनिहें। उ हमार जनम-जनम के साथ छुड़ा के ही दम लिहें।"
इतना कहकर लीला फिर से फूट-फूट कर रोने लगती है। गायत्री उसे गले लगाकर चुप कराने की कोशिश कर ही रही होती है कि तभी आँगन से गायत्री की माँ की आवाज गूँजती है। गायत्री लीला के सिर पर हाथ फेरती है और उसे संभलने की हिदायत देती है।
गायत्री: "तू चुपचाप यहीं बैठ, रो मत। हम अभी माँ के देख के आवत बानी।"
गायत्री कमरे से बाहर चली जाती है। उस रात लीला के गले से भोजन का एक निवाला भी नीचे नहीं उतरता। वह बिना कुछ खाए-पिए, रोते-सुबकते हुए न जाने कब सो जाती है।
दृश्य (बदलता है): दो महीने बाद, दशहरे का दिन।
गाँव के हर छोटे-बड़े इंसान के चेहरे पर खुशी की एक नई लहर दौड़ रही थी। चारों तरफ ढोल-नगाड़ों और पूजा के गीतों की गूंज थी। गाँव की लड़कियाँ और औरतें सज-धजकर मेले में एक-दूसरे से बेहतर दिखने की होड़ में लगी हुई थीं। उस खास दिन गायत्री और लीला ने भी खुद को कुछ इस तरह से संवारा था कि उनका रूप देखते ही बनता था। जब दोनों सहेलियाँ सजकर गली से गुजरीं, तो मोहल्ले के दिलफेंक आशिक उन्हें एकटक देखते रह गए और अपनी आहें रोकने के लिए होठों पर जीभ फिराए बिना नहीं रह पाए।
लेकिन इस चमक-दमक के बीच, लीला का मन आज सुबह से ही बहुत उखड़ा हुआ और भारी सा था। उसके चेहरे पर उदासी साफ झलक रही थी। जब गायत्री ने उसकी पीठ पर हाथ रखकर बड़े प्यार से इस उदासी का कारण पूछा, तो लीला की आँखें फिर से भर आईं।
लीला (एक ठंडी सांस लेकर): "गीतू, आज सुबह से ही हमार दिल कहीं नहीं लगत बा। अजीब सी बेचैनी हो रहल बिया। बस दिल करता कि काश... आज के दिन हम अपना संतोष के साथ होतीं, त इ त्योहार और इ मौसम कितना सुहावना लगता!"
लीला की बातें सुनकर गायत्री भी खामोश हो जाती है, क्योंकि उसे पता था कि इस हँसते हुए चेहरे के पीछे कितना गहरा दर्द छुपा है।लीला की आँखों में बहते हुए आँसू देखकर गायत्री का दिल पसीज जाता है। वह उसे हौसला देने के लिए अपने सीने से लगा लेती है और रोती हुई लीला को संभालते हुए अपने बेडरूम में ले जाती है। वह लीला के आँसू पोंछती है और ढाढस बंधाते हुए कहती है।
गायत्री: "तू चुप हो जा लीलावती! ऐसन कुछ न होई जेकरा से तोहार साथ-साथ केहू और के भी जिंदगी बर्बाद हो जाए। हम बाforce बानी न तोहार साथ, तू हिम्मत मत हार।"
लीला अभी भी बुरी तरह कांप रही थी। वह सुबकते हुए गायत्री की तरफ देखती है और अपनी बेबसी बयां करती है।
लीला (रोते हुए): "हाँ गीतू... हम पहले ही से जानत रहनी की हमार बाबूजी हमार बात कभी ना मनिहें। उ हमार जनम-जनम के साथ छुड़ा के ही दम लिहें।"
इतना कहकर लीला फिर से फूट-फूट कर रोने लगती है। गायत्री उसे गले लगाकर चुप कराने की कोशिश कर ही रही होती है कि तभी आँगन से गायत्री की माँ की आवाज गूँजती है। गायत्री लीला के सिर पर हाथ फेरती है और उसे संभलने की हिदायत देती है।
गायत्री: "तू चुपचाप यहीं बैठ, रो मत। हम अभी माँ के देख के आवत बानी।"
गायत्री कमरे से बाहर चली जाती है। उस रात लीला के गले से भोजन का एक निवाला भी नीचे नहीं उतरता। वह बिना कुछ खाए-पिए, रोते-सुबकते हुए न जाने कब सो जाती है।
दृश्य (बदलता है): दो महीने बाद, दशहरे का दिन।
गाँव के हर छोटे-बड़े इंसान के चेहरे पर खुशी की एक नई लहर दौड़ रही थी। चारों तरफ ढोल-नगाड़ों और पूजा के गीतों की गूंज थी। गाँव की लड़कियाँ और औरतें सज-धजकर मेले में एक-दूसरे से बेहतर दिखने की होड़ में लगी हुई थीं। उस खास दिन गायत्री और लीला ने भी खुद को कुछ इस तरह से संवारा था कि उनका रूप देखते ही बनता था। जब दोनों सहेलियाँ सजकर गली से गुजरीं, तो मोहल्ले के दिलफेंक आशिक उन्हें एकटक देखते रह गए और अपनी आहें रोकने के लिए होठों पर जीभ फिराए बिना नहीं रह पाए।
लेकिन इस चमक-दमक के बीच, लीला का मन आज सुबह से ही बहुत उखड़ा हुआ और भारी सा था। उसके चेहरे पर उदासी साफ झलक रही थी। जब गायत्री ने उसकी पीठ पर हाथ रखकर बड़े प्यार से इस उदासी का कारण पूछा, तो लीला की आँखें फिर से भर आईं।
लीला (एक ठंडी सांस लेकर): "गीतू, आज सुबह से ही हमार दिल कहीं नहीं लगत अजीब सी बेचैनी हो रहल बा। बस दिल करता कि काश...आज के दिन हम अपना संतोष के साथ होतीं, त इ त्योहार और इ मौसम कितना सुहावना लागीत!"
लीला की बातें सुनकर गायत्री भी खामोश हो जाती है, क्योंकि उसे पता था कि इस हँसते हुए चेहरे के पीछे कितना गहरा दर्द छुपा है।
लीला की बातें सुनकर गायत्री का दिल पिघल जाता है। वह लीला को अपनी बाहों में भर लेती है और उसके माथे और गालों को चूमती हुई दुलार से कहती है।
गायत्री: "चल पागल! तू आज हमके ही आपन संतोष समझ ले। आज हम अपना गाँव के मशहूर मनेनी मेला के हर कोना-कोना तोहके देखाइब। और जो-जो तू कहबू, हम सब तोहके खियाइब।"
गायत्री की इस लाडली बात पर लीला के चेहरे पर मुस्कान लौट आती है। वह शरारत से गायत्री की कमर में चिकुटी काटती है और उसे छेड़ते हुए कहती है।
लीला: "अच्छा! त तोहके अभी से ही रामू मनीऑर्डर भेजे लगले का, जो इतना खर्चा करे खातिर तैयार बाड़ू?"
लीला का यह ताना सुनकर दोनों सहेलियाँ खिलखिलाकर हँस पड़ती हैं। कुछ देर की इस मीठी नोकझोंक के बाद गायत्री कहती है, "अच्छा चल अब, देर होखत बा। लौटे में भी समय लगी।"
इतना कहकर दोनों सहेलियाँ राजू (गायत्री का 7 साल का छोटा भाई/रमेश का साला बाबू) का हाथ थामती हैं और तीनों मेले की तरफ चल पड़ते हैं। वे अभी घर की चौखट लांघ ही रहे थे कि गायत्री की माँ दरवाजे पर आकर खड़ी हो जाती हैं। वह फिक्र भरी आवाज में गायत्री को टोकती हैं।
माँ: "गीतू! जल्दी ही लौट अइहअ दोनों जन। देर हो जाई त तोहार बाबूजी बहुत खिसिइहें (गुस्सा करेंगे)।"
गायत्री (पीछे मुड़कर हाथ हिलाते हुए): "ना माई, तू चिंता मत कर। हमनी जल्दी ही घूम के आ जाइब।"
यह कहकर गायत्री, लीला और छोटे राजू को लेकर उमंग से भरे मेले की ओर बढ़ जाती है। रास्ते की धूल और त्योहार की रौनक उनके कदमों को और तेज कर देती है।लीला की बातें सुनकर गायत्री का दिल पिघल जाता है। वह लीला को अपनी बाहों में भर लेती है और उसके माथे और गालों को चूमती हुई दुलार से कहती है।
गायत्री: "चल पागल! तू आज हमके ही आपन संतोष समझ ले। आज हम अपना गाँव के मशहूर मनेनी मेला के हर कोना-कोना तोहके देखाइब। और जो-जो तू कहबू, हम सब तोहके खियाइब।"
गायत्री की इस लाडली बात पर लीला के चेहरे पर मुस्कान लौट आती है। वह शरारत से गायत्री की कमर में चिकुटी काटती है और उसे छेड़ते हुए कहती है।
लीला: "अच्छा! त तोहके अभी से ही रामू मनीऑर्डर भेजे लगले का, जो इतना खर्चा करे खातिर तैयार बाड़ू?"
लीला का यह ताना सुनकर दोनों सहेलियाँ खिलखिलाकर हँस पड़ती हैं। कुछ देर की इस मीठी नोकझोंक के बाद गायत्री कहती है, "अच्छा चल अब, देर होखत बा। लौटे में भी समय लगी।"
इतना कहकर दोनों सहेलियाँ राजू (गायत्री का 7 साल का छोटा भाई/रमेश का साला बाबू) का हाथ थामती हैं और तीनों मेले की तरफ चल पड़ते हैं। वे अभी घर की चौखट लांघ ही रहे थे कि गायत्री की माँ दरवाजे पर आकर खड़ी हो जाती हैं। वह फिक्र भरी आवाज में गायत्री को टोकती हैं।
माँ: "गीतू! जल्दी ही लौट अइहअ दोनों जन। देर हो जाई त तोहार बाबूजी बहुत खिसिइहें (गुस्सा करेंगे)।"
गायत्री (पीछे मुड़कर हाथ हिलाते हुए): "ना माई, तू चिंता मत कर। हमनी जल्दी ही घूम के आ जाइब।"
यह कहकर गायत्री, लीला और छोटे राजू को लेकर उमंग से भरे मेले की ओर बढ़ जाती है। त्योहार की रौनक उनके कदमों को और तेज कर देती है।
मनेनी के दशहरे मेले में पहुँचकर दोनों सहेलियाँ चहकती हुई खूब खरीदारी करती हैं। अपने छोटे भाई राजू के साथ वे खुद भी घूमती हैं और खूब खाती-पीती हैं। तभी अचानक लीला की नजर मेले में आए एक नए शादीशुदा जोड़े पर पड़ती है, जो हँस-हँसकर एक-दूसरे के मुँह में गर्म-गर्म जलेबी खिला रहे थे। थोड़ा आगे एक और नया जोड़ा एक-दूसरे की बांहों में बांहें डाले लकड़ी की बड़ी चरखी (झूले) पर बैठकर घूम रहा था।
मेले की इस भीड़ में दूसरों की खुशियाँ देखकर लीला को अपने संतोष की याद बुरी तरह तड़पाने लगती है। उसकी आँखों में आंसुओं का सैलाब उमड़ पड़ता है। वह चाहकर भी खुद को संभाल नहीं पाती। उसकी हालत देख गायत्री उसे भीड़ से थोड़ा दूर एक शांत कोने में ले जाती है, जहाँ तीनों एक जगह बैठ जाते हैं। लीला गायत्री का हाथ कसकर पकड़ लेती है।
लीला (कांपती आवाज में): "देख गीतू... इहे मौका बा! आज अगर हम अपना संतोष से ना मिलनी, त सारी जिंदगी हमके रो-रो के ही गुजारे के पड़ी।"
लीला की आँखों का पागलपन देखकर गायत्री को किसी बड़ी अनहोनी का अहसास होता है। वह डरकर पूछती है।
गायत्री: "का मतलब? तू कहल का चाहत बाड़ू लीला?"
लीला (दृढ़ता और बेबसी के मिले-जुले भाव से): "देख गीतू, तू त जानत बाड़ू की हमार बाबूजी खुद के अपना जबान के कितना पक्का आदमी मानेलन। उ जे तय कर देलन, ओकरा से पीछे ना हट्स।"
गायत्री (बीच में ही बोलते हुए): "हाँ, उ त हमहूँ जानत बानी, बाकी..."
लीला (बात काटते हुए): "और हम... हम संतोष से अलग हो के कभी जिंदा नहीं रह सकत गीतू! बस, अब बहुत भइल। यहाँ से तू अब राजू के लेके अकेले ही घर जा। हम आज यहीं से सीधे कलकत्ता चल जाइब। वहाँ जाके हम अपना बाबूजी के मनावे के एक आखिरी कोशिश करब। अगर उ ना मनलें, त हम ओही लोगन के सामने संतोष के साथ कोर्ट मैरिज कर लेहम।"
लीला का यह आत्मघाती फैसला सुनकर गायत्री के होश उड़ जाते हैं। वह डर से कांप उठती है और लीला के दोनों कंधे पकड़कर उसे झकझोरती है।
गायत्री (घबराकर रोते हुए): "ना लीला! तू इ का कहत बाड़ू? हमके त हमार बाबूजी जान से ही मार दिहें! लीला देख, तू भगवान पर भरोसा कर, उ तोहार बात जरूर सुनिहें। तोहरा अइसे अचानक कलकत्ता चल जाए से तोहके मालूम बा की तोहार पिता जी कितना गुस्सा हो सकत बाड़न? उ हमार बाबूजी के कितना कुछ कहीहन की एगो लड़की के तू संभाल के ना रख सकल! हो सकता की पूरा गाँव-जवार में भी हमार बाबूजी के बदनामी हो जाए। देख लीला... हम तोहार बहन होखे के साथ-साथ तोहार सबसे पक्की सहेली भी बानी। हम तोहार जज्बात के अच्छी तरह से समझत बानी, बाकी तू हमार बात मान के अभी घर चल, सब ठीक हो जाई।"
मेले के शोर-शराबे के बीच दोनों बहनें एक-दूसरे का हाथ थामे आँसू बहा रही थीं। एक तरफ प्यार का इम्तिहान था, तो दूसरी तरफ परिवार की इज्जत।
गायत्री लीला के इरादों को भांपकर, उसे रोकने और समझाने की एक आखिरी कोशिश करती है। वह लीला के दोनों हाथों को अपने हाथों में भींच लेती है।
गायत्री (रोते हुए मिन्नत भरे लहजे में): "लीला सुन! आज से पहले हम अपना माई-बाबूजी से कभी भी केहू के शादी-ब्याह के बारे में बात नहीं कर पइली। लेकिन आज... आज हम वादा करत बानी की हम अपना घर के लोगन के साथ-साथ तोहार बाबूजी से भी तोहार और संतोष के शादी के बारे में खुद बात करब। बस तू आज हमरा साथे चुपचाप घर चल।"
लीला (पागलपन की हद तक बेबस होकर): "ना गीतू! तू बात के गहराई नहीं समझ सकत बाड़ू। तू हमके आज जाए दे, इ हमार जिंदगी के सवाल बा। हमके हमार प्यार बुलावत बा! अगर तू हमके आज यहाँ से नहीं जाए देबू... त हम यहीं कौनो गाड़ी के नीचे आके आपन जान दे देहम, बाकी बिना संतोष के घर वापस नहीं जाइब!"
लीला की आँखों में मौत का यह खौफनाक दृढ़ संकल्प देखकर गायत्री भीतर तक थर्रा जाती है। वह समझ जाती है कि लीला इस वक्त कुछ भी अनहोनी कर सकती है। गायत्री अभी कुछ सोच पाती या लीला को संभाल पाती, कि तभी अचानक मेले के शोर को चीरती हुई एक बेहद डरावनी और जोर की आवाज गूँजती है।
अजनबी आवाज (चीखते हुए): "अरे! इ लइका केकर बा हो? पकड़ा ओकरा के, ना त अभी इ हमरा गाड़ी के नीचे आ जाइत!"
उस अनजानी आवाज को सुनकर गायत्री के होश उड़ जाते हैं। वह झटके से पीछे मुड़कर देखती है, जहाँ एक आदमी उसी की तरफ इशारा कर रहा था। दरअसल, गायत्री और लीला को अपनी बातों में इस कदर खोया देख, सात साल का छोटा राजू खेलते-खेलते खिलौनों की एक दुकान की तरफ जाने लगा था। उसी दौरान सड़क पार करते समय अचानक एक तेज रफ्तार स्कॉर्पियो गाड़ी ब्रेक मारते हुए उसके ठीक सामने आकर रुकी थी।
राजू को खतरे में देख गायत्री का कलेजा मुँह को आ जाता है। वह "राजू...!" चीखती हुई पूरी ताकत से राजू को बचाने के लिए उस तरफ दौड़ पड़ती है।
इधर, लीला जैसे ही देखती है कि गायत्री का ध्यान पूरी तरह हट चुका है और वह उससे दूर जा चुकी है, वह इसे ही अपनी जिंदगी का आखिरी मौका मान लेती है। वह बिना एक पल गँवाए, सामने बने छोटे से बस स्टेशन की तरफ भागती है। वहाँ से एक बस अभी-अभी धीमी गति से खुलकर आगे बढ़ने ही वाली थी। लीला आंसुओं से भरी आँखों और भारी लहंगे को संभाले, अपनी मोहब्बत को पाने के जुनून में, उस चलती हुई बस को पकड़ने के लिए पागलों की तरह दौड़ने लगती है।
गायत्री जैसे ही हाँफते हुए राजू को सुरक्षित पकड़ती है, वह झटके से पीछे मुड़कर देखती है। सामने का नजारा देख उसकी आँखें फटी की फटी रह जाती हैं। लीला भागती हुई बस के पीछे पागलों की तरह दौड़ रही थी। गायत्री बिना एक पल गँवाए राजू को वहीं मेले में सब्जी बेच रहे अपने ही गाँव के एक बुजुर्ग के हवाले करती है।
गायत्री (बुजुर्ग से): "काका! तनी राजू के पकड़े रहब, हम अभी आवत बानी।"
इतना कहकर गायत्री पूरी ताकत से बस की तरफ दौड़ पड़ती है। वह रोते-चीखते हुए आवाज लगाती है, "रुक जा लीला! रुक जा! लीइइइइलाआआ... रुक जा!"
लेकिन मेले के शोर-शराबे और इंजन की गड़गड़ाहट के बीच उसकी आवाज दबकर रह जाती है। लीला तब तक पूरी ताकत लगाकर चलती बस का लोहे का हैंडल पकड़ चुकी होती है और पायदान से होते हुए ऊपर चढ़ जाती है। बस अपनी रफ्तार पकड़ने लगती है। लीला बस की खिड़की के पास आकर बैठती है। वह आंसुओं से धुंधली हो चुकी आँखों से पीछे छूटती हुई गायत्री को देखती है। वह अपने दुपट्टे के कोने से आँसू पोंछती है।
लीला (मन ही मन रोते हुए): "हमके माफ कर दिहअ गीतू... हमारा पास और कौनो रास्ता ना रहे।"
बस के पहिए लीला को उसकी मंजिल की ओर लेकर आगे बढ़ जाते हैं। इधर धूल के गुबार के बीच खड़ी गायत्री बेबसी से उस जाती हुई बस को तब तक देखती रहती है, जब तक कि वह आँखों से ओझल नहीं हो जाती। उसका पूरा शरीर कांप रहा था। वह भारी और बोझिल कदमों से वापस लौटती है, बुजुर्ग काका से राजू को गोद में उठाती है और घर की तरफ चल पड़ती है।
अब तो गायत्री के कदम जैसे घर की तरफ बढ़ने से साफ इनकार कर रहे थे। बदनामी और बाबूजी के गुस्से का खौफ उसके सिर पर नाच रहा था। वह चलते-चलते कभी रास्ते की पगडंडी पर सिर पकड़कर बैठ जाती, तो कभी सुबकते-रोते हुए आगे बढ़ने लगती। जो रास्ता आधे घंटे का था, उसे तय करने में गायत्री को तीन घंटे लग गए। वह वक्त से बहुत लेट, ढलती शाम के सन्नाटे में घर पहुँचती है।
घर के मुख्य दरवाजे पर ही उसके बाबूजी (राधे मोहन) और दादा जी को खड़े देखकर गायत्री का दिल धक से रह जाता है। उसका गला सूख जाता है। वह यही सोचकर थर-थर कांप रही थी कि आखिर वह उन्हें क्या जवाब देगी? तभी ओसारे में बैठे दादा जी की नजर उस पर पड़ती है। वह चौंककर राधे मोहन से कहते हैं।
दादा जी: "राधे! देख त बाबू, गीतू अकेले ही आवत बिया का? लीलावती ओकरा साथे नहीं दिखाई देत !"
दादा जी के मुंह से यह बात सुनते ही आँगन में मौजूद हर शख्स के चेहरे पर एक अनहोनी का काला साया छा जाता है। सब की सब निगाहें गहरी शंका और डर से गायत्री की तरफ मुड़ जाती हैं। गायत्री की माँ का कलेजा कांप उठता है। वह दौड़ती हुई गायत्री के पास जाती है और उसके दोनों कंधे पकड़कर आहिस्ता से, घबराई हुई आवाज में पूछती है।
माँ (फिक्र से): "गीतू! का भइल बेटा? तू इतना उदास काहे बाड़ू? तोहार आँख में आँसू काहे बा... और लीलावती कहाँ बाड़ी? उ तोहरा साथे घर काहे नहीं आइली?"
गायत्री माँ के गले लगकर फटने ही वाली थी, लेकिन सामने खड़े बाबूजी की कड़क नजरें उसे अपनी जुबान खोलने से रोक रही थीं।
माँ के इन सारे फिक्रमंद सवालों का जवाब गायत्री के पास नहीं था। वह बस रोते हुए अपनी माँ का चेहरा देखती है और भीतर का सारा डर आंसुओं के रास्ते बह निकलता है। वह फफक-फफक कर रोती हुई सीधे अपनी माँ के कंधे से जा लगती है।
तभी ओसारे से उतरकर उसके पिता जी (राधे मोहन) भी भारी कदमों से वहाँ आ पहुँचते हैं। उनका चेहरा गुस्से से तमतमाया हुआ था। वह गायत्री के सामने आकर कड़क और रौबदार आवाज में पूछते हैं।
राधे मोहन: "गायत्री! रोना बंद कर और साफ-साफ बता... लीलावती कहाँ बिया?"
पिता जी की उस कड़क और डरावनी आवाज को सुनते ही गायत्री डर से कांप उठती है। वह सुबकते और हिचकियाँ लेते हुए सच उगल देती है।
गायत्री (रोते हुए): "बाबूजी... लीला हमके मेला में छोड़ के कलकत्ता चल गइल।"
गायत्री के मुँह से यह बात पूरी तरह खत्म भी नहीं हुई थी कि गुस्से और बदनामी के डर से बौखलाए राधे मोहन ने आव देखा न ताव, अपनी सबसे लाडली बेटी गायत्री के चेहरे पर एक जोरदार थप्पड़ जड़ दिया। थप्पड़ की आवाज से पूरा आँगन गूँज उठा।
गायत्री चीखकर जमीन पर गिरने ही वाली थी कि उसकी माँ ने तड़पकर उसे अपनी बाहों में भर लिया। वह गायत्री को अपने आंचल में छुपाने की कोशिश करते हुए रोते-रोते राधे मोहन पर चिल्लाईं।
माँ (रोते हुए): "अरे! मारअ मत एकरा के! गीतू के का दोष बा? सब दोष त उ लीलावती के रहे। इहे (गीतू) थोड़े न कहले होई की तू मेला से कलकत्ता चल जा!"
राधे मोहन का गुस्सा अब अपनी पत्नी पर फूट पड़ता है। वह लाल-पीली आँखों से उन पर चिल्लाते हैं।
राधे मोहन: "चुप रहअ तू! हम पहले ही तोहरा से मना करत रहनी की इन दोनों के एक साथ मेला में मत जाए द। दोनों जवान लड़की बाड़ी सन, बाकी तोहरा त अपनी लाडली के आगे कुछ सुनबे नहीं करे के रहे! अब बताव... अब सियाराम (लीला के पिता जी) जी के कौन जवाब दी? तू देबू की हम देब?"
राधे मोहन की आवाज में गुस्से से ज्यादा समाज में नाक कटने का खौफ साफ झलक रहा था। आँगन में एक गहरा और डरावना सन्नाटा पसर जाता है।
दृश्य: लीला के घर का बैठक (ड्राइंग रूम)। पुराना समय बीत चुका था और दोनों दोस्त वर्तमान की हकीकत में आमने-सामने बैठे थे।
लीला (अतीत की यादों से बाहर आते हुए): "रमेश... ओकरा बाद हम गीतू के धोखा देके मनेनी मेला से कलकत्ता ना जा के सीधे संतोष के घर सिताब दियारा गइनी। और हमनी दोनों कलकत्ता जाके अपना माई-बाबूजी के फोन पर अपना आवे के बारे में बतवनी, लेकिन हमार बाबूजी हमके हमेशा के खातिर अपना घर में ना आवे के हिदायत दे देलन। अब रामू तू ही बताव, की हम कितना खुश रहीं? आखिर हम का गुनाह कर देले बानी की हमार अपना परिवार हमसे मुँह मोड़ लिहलक?"
लीला की भर्राई हुई आवाज और उसकी आँखों के आंसुओं को देखकर रमेश का खुद का भी गला रुंध जाता है। उसका दिल अपनी उस पुरानी सहेली के लिए पसीज उठता है। वह गहरी सांस लेकर अपने आप को संभालता है और तसल्ली देते हुए कहता है।
रामू (रमेश): "भगवान पर भरोसा करीं लीला जी, सब ठीक हो जाई। बाकी एक बात बताईं... आखिर राउर पिता जी इस शादी से इतना नाखुश काहे बानी? का संतोष अच्छा लड़का नइखन, या फिर उनकी पढ़ाई-लिखाई में कोई कमी रहे?"
रमेश के इन सीधे सवालों के जवाब में लीला का चेहरा गर्व और संतोष से चमक उठता है। वह अपनी आँखें पोंछते हुए बताती है।
लीला: "ना-ना रामू! संतोष के संगिनी बनके हम खुद के ऊपर बहुत गर्व महसूस करत बानी। इ बात हमार बाबूजी और माई भी अच्छी तरह से जानत बानी। संतोष MBA करके आज आपन खुद के बिजनेस कर रहल बाड़न, आज तक हमके किसी चीज के कोई कमी नहीं भइल। हमार लइका-बच्चा भी बहुत अच्छे स्कूल में पढ़-लिख रहल बाड़न। आज शाम के जब संतोष घर अइहें, त तू खुद उनकरा से मिलके उनके बारे में सब जान जइब।"
रमेश और लीला दोनों इसी तरह अतीत और वर्तमान के ताने-बाने बुनते हुए बातें कर रहे होते हैं। कमरे में चाय की खुशबू के साथ सालों पुराना अपनापन फिर से महकने लगा था।
दृश्य: (बदलता है) रात का समय, लगभग 9 से 10 बजे के बीच।
रात्रिकालीन भोजन (डिनर) की छोटी सी मेज पर रमेश और लीला एक-दूसरे के आमने-सामने बैठे थे। मेज की दूसरी तरफ लीला के पति संतोष अपने दोनों बच्चों के साथ बैठे थे। लीला बड़े प्यार से सबको गरम-गरम खाना परोस रही थी। माहौल शांत था। तभी संतोष रमेश की तरफ देखते हैं और सहजता से उनका हाल-चाल पूछते हैं।
संतोष: "और बताईं भाई साहब, सब ठीक-ठाक बा न?"
रमेश (एक दर्दभरी फीकी मुस्कान के साथ): "बस सब ठीक ही बा भाई साहब... ऊपर वाले की मेहरबानी बा की अभी तक कइसे हूँ जिंदा ही बानी।"
संतोष: "अरे! अइसन काहे कहत बाड़न भाई साहब? भगवान करस की रउवा अभी सौ साल और जिंदा रहीं!"
रमेश इस विषय पर आगे और कोई बात नहीं करना चाहता था। वह चुपचाप नजरें झुकाकर खाना खाता है और हाथ-मुँह धोकर सोने के लिए उन्हें दिए गए कमरे में चला जाता है।
इधर, अपने बेडरूम में लीला और संतोष सोने की तैयारी कर रहे थे। लीला अपने पति के पास आती है और धीमी आवाज में कहती है।
लीला: "जानत बानी... रमेश बहुत दुखी इंसान बाड़न, मगर दिल के बहुत बड़ा भी।"
संतोष का दिल तो रमेश को पहली नजर में देखकर ही सहानुभूति से भर गया था। अब लीला की इस बात को सुनकर उनसे और रहा नहीं गया। उनके मन की उत्सुकता जाग उठी।
संतोष: "लीलू, हम रमेश जी के बारे में कुछ पूछे के चाहत बानी। आखिर उ इतने दिनों बाद कहाँ से आवत बाड़न? उनके चेहरे पर इतना गम काहे बा?"
संतोष अपनी उत्सुकता शांत करने के लिए लीला को साथ लेते हैं और सीधे रमेश के कमरे की तरफ आते हैं। कमरे में हल्की रोशनी थी और रमेश बिस्तर पर लेटा हुआ सोने की नाकाम कोशिश कर रहा था। आहट पाकर वह उठ बैठता है।
रमेश: "आईं जा, बइठी जा।"
संतोष और लीला दोनों उसके बिस्तर के पास रखी कुर्सियों पर बैठ जाते हैं। लीला रमेश के करीब आती है और सीधे उसकी आँखों में झांकते हुए पूछती है।
लीला: "रामू, तू हमके अभी तक बतवल ना की तू कहाँ से आवत बाड़अ? और इतना दिन कहाँ रहल? तोहरा साथ में आखिर का भइल रहे?"
लीला के इन सवालों को सुनकर रमेश का सब्र का बांध टूट जाता है। कमरे के सन्नाटे को चीरती हुई उसके मुँह से एकाएक एक खौफनाक हकीकत निकलती है—
रमेश (शून्य में ताकते हुए): "जेल से...!"
यह शब्द सुनते ही कमरे की हवा जैसे जम जाती है। लीला और संतोष दोनों के होश उड़ जाते हैं।
लीला और संतोष (एक साथ चौंकते हुए): "काssssssss! जेsssssल से.........!"
रमेश (भारी और संजीदा आवाज में): "हाँ संतोष जी, हम खून के जुर्म में पूरे बीस बरस (20 साल) के कठोर सजा काट के वापस आवत बानी।"
लीला का पूरा शरीर कांप उठता है। वह रमेश के दोनों हाथ अपने हाथों में थाम लेती है, उसकी आँखें फटी की फटी रह जाती हैं।
लीला: "रमेश! तू जेल काहे गइल रहलू? तू त अइसन इंसान बाड़ू की चींटी के भी ना मारू... तू कौनो कत्ल कइसे कर सकत बाड़अ? हमके कुछ समझ नहीं आवत बा, तू हमके सब कुछ साफ-साफ बताव की आखिर का भइल रहे!"
रमेश एक लंबी और भारी सांस लेता है। अपनी कांपती उँगलियों से चश्मा ठीक करता है और अपनी जिंदगी की उस सबसे खौफनाक और काली रात की आपबीती सुनाना शुरू करता है।
फ्लैशबैक दृश्य: रमेश के बचपन के दिन, जब वह महज 8 साल का था।
दीपावली आने में अभी एक सप्ताह का समय बाकी था। गाँव के हर मोहल्ले में त्योहार की तैयारियाँ जोर-शोर से चल रही थीं। हर कोई अपने-अपने घरों की साफ-सफाई और लीपाई-पोताई में जुटा हुआ था। कोई अपने पक्के कमरों को चूने से पोत रहा था, तो कोई मिट्टी और गोबर से कच्चे ओसारे की लीपाई करने में मग्न था। पूरे गाँव में त्योहार की एक सोंधी सी खुशबू बिखरी हुई थी।
रमेश के घर के सामने धूप पसरी हुई थी। उसके पिता जी, रामदयाल जी दरवाजे पर बिछी चारपाई पर आराम से बैठे चश्मा लगाकर अखबार पढ़ रहे थे। रमेश की माँ भी घर के दरवाजों और खिड़कियों की धूल साफ करने में जुटी हुई थीं। नन्हा रमेश अपनी माँ की मदद करने के लिए एक बाल्टी से छोटे से जग में पानी निकाल-निकाल कर उन्हें दे रहा था। माँ-बेटे के बीच की यह मासूमियत देखते ही बनती थी।
तभी गाँव के एक जाने-माने साहूकार, सेठ दशरथ जी दो अनजान आदमियों के साथ वहाँ आते हैं।
सेठ दशरथ: "राम-राम रामदयाल जी! और सुनाव, का हाल-चाल बा?"
रामदयाल जी दशरथ जी को देखकर तुरंत चारपाई से खड़े हो जाते हैं। वे दशरथ जी के साथ आए दोनों नए मेहमानों (नवागंतुकों) का भी आदर के साथ स्वागत करते हैं।
रामदयाल (पिता जी): "जय राम जी की दशरथ भइया! सब बहुत बढ़िया बा। और सुनाव, तोहार का हाल बा? बाकी इहाँ साथे आए सब के-के बा, हम पहचननी ना?"
सेठ दशरथ (मुस्कुराते हुए): "अरे भाई, सब बतावत बानी, थोड़ा सबर रखअ। पहले मेहमानन खातिर कुछ जलपान त मँगवाव!"
रामदयाल जी: "हाँ-हाँ भइया, काहे ना! बिल्कुल।"
इतना कहकर रामदयाल जी अपने 8 साल के बेटे को आवाज लगाते हैं, "रामू! जरा घर से कुछ जलपान करे के त ले के आवअ बेटा।"
नन्हा रमेश अपने पिता जी की बात सुनकर कहता है, "अच्छा बाबूजी!" और वह जलपान का सामान लेने अपनी माँ के साथ घर के अंदर चला जाता है।
इधर ओसारे में, दशरथ जी रामदयाल जी को उन दोनों अनजान आदमियों का परिचय कराते हुए गंभीर आवाज में कहते हैं।
सेठ दशरथ: "रामदयाल जी, इ बाड़न राधे मोहन जी (गायत्री के पिता) और इ बाड़न इनकर पिता जी, श्री भरत लाल जी (गायत्री के दादा जी)। रामदयाल जी, हम तोहरा से पहले ही कहले रहनी न की हम तोहार बड़का लड़का (रमेश का बड़ा भाई) मनोज के शादी खातिर एगो बहुत बढ़िया लड़की देखले बानी। त अब तू खुद देख ले... इहे ओही लड़की के परिवार ह!"
दशरथ जी की यह बात सुनकर रामदयाल जी के चेहरे पर उत्सुकता और बड़प्पन के भाव आ जाते हैं।
सेठ दशरथ (शरारती लहजे में आँख मारते हुए): "मेजर साहब बाकी तिलक दहेज़ में कुछ ना मिली! "
दशरथ जी हमेशा की तरह मजाक करने का कोई मौका नहीं छोड़ते थे। रामदयाल जी खिलखिलाकर हँस पड़ते हैं और चारपाई पर बैठते हुए कहते हैं।
रामदयाल (पिता जी): "राजा दशरथ! तू कभी सुधरब ना। इ त सबके ऊपर बा बिना दान दहेज़ के केकरो बियाह शादी होता इहो सभे के लईका होइहन ता का इ लोग बिना दहेज़ के शादी बियाह करीहें? हम बिना दहेज़ के आपन लईका ना देहम तू जा दोसर दुआर देख लअ, कहने के बाद वो हॅसने लगते हैं।
तीनों बड़े-बुजुर्ग अभी हँस ही रहे थे कि तभी नन्हा रामू (रमेश) एक चमचमाते पीतल के जग में पानी और एक प्लेट में ताजी मिठाइयाँ लेकर ओसारे में आता है। वह बड़े सलीके से मेज पर प्लेट रखता है और दशरथ जी के साथ दोनों नए मेहमानों के सामने सिर झुकाकर आदर से कहता है, "प्रणाम !"
सेठ दशरथ (रामू के सिर पर हाथ फेरते हुए): "खुश रहअ बेटा! खूब पढ़अ-लिखअ।"
इतना कहकर दशरथ जी अपने कुरते की जेब में हाथ डालते हैं और बड़े जतन से रखी एक रंग-बिरंगी टॉफी निकालकर नन्हें रामू की हथेली पर रख देते हैं। टॉफी पाकर रामू का चेहरा खुशी से खिल उठता है और वह उछलता-कूदता हुआ अंदर घर में भाग जाता है।
अब सेठ दशरथ जी अपने साथ आए दोनों मेहमानों की तरफ मुड़ते हैं और गर्व से रामदयाल जी की तरफ इशारा करते हुए उनका परिचय देते हैं।
सेठ दशरथ: "राधे जी, भरत जी... इ बाड़न अपने रामदयाल जी। फौज से रिटायर मेजर साहब हवन! पूरे इलाके में इनकर कड़क अनुशासन और रसूख के मिसाल देवल जाला। इनकर बड़का लड़का कॉलेज की पढ़ाई पूरी कइला के बाद, गाँव से थोड़ा दूर शहर के बाजार में आपन खुद के बिजनेस संभालत बाड़े।"
रामदयाल जी मेहमाननवाजी में कोई कमी नहीं छोड़ना चाहते थे। वह मुस्कुराते हुए कहते हैं, "अरे, पहले रउवा सब जलपान त करीं, बात त होत ही रही।"
तीनों मेहमान मिलकर पानी पीते हैं और मिठाई खाते हैं। जलपान खत्म करने के बाद दशरथ जी अपनी मूंछों पर हाथ फेरते हुए मुख्य मुद्दे पर आते हैं।
सेठ दशरथ: "अच्छा त रामदयाल भाई, अब इ बताव की बड़का कहाँ बाड़े? ओकरा के इहाँ बोलावा भाई! इ सब लोग खास तौर पर लड़का देखे खातिर ही आइल बाड़न। हमनी के आज ही वापस लौटे के भी बा।"
रामदयाल जी (लाजमी हक जताते हुए): "अरे भाई! लौटे के काहे ह? आज यहीं रुक जाईं जा। का इहाँ मेजर के घर खाना-पीना ना मिली?"
रामदयाल जी के इस अपनेपन को देखकर गायत्री के पिता, राधे जी हाथ जोड़ते हुए बड़े संकोच से कहते हैं।
राधे (गायत्री के पिता): "ना-ना मेजर साहब, अइसन कौनो बात नइखे। रउवा यहाँ त छप्पन भोग मिली। दरअसल बात इ बा की आज ही शाम के हमार 6 साल के एगो बिटिया (गायत्री) अपना फूफा जी, सियाराम जी के साथ कलकत्ता से आवे वाली बिया। घर में मेहमान आ रहे बाड़न, येही से हमनी के आज ही घर पहुँचकल थोड़ा जरूरी बा।"
'कलकत्ता' और 'सियाराम जी' का नाम सुनते ही ओसारे में बैठे मेजर साहब के चेहरे पर एक गंभीर संतुष्टि के भाव आ जाते हैं।
रामदयाल जी तुरंत अंदर कमरे में जाते हैं और बाजार से लौटकर तैयार बैठे अपने बड़े लड़के मनोज को बाहर ओसारे में बुला लाते हैं। मनोज शांत, गंभीर और संस्कारी कदमों से आकर बड़े-बुजुर्गों के सामने खड़ा हो जाता है। उसका सजीला रूप और सरल स्वभाव देखते ही राधा मोहन जी और उनके पिता श्री भरत लाल जी का चेहरा खिल उठता है। दोनों को लड़का पहली ही नजर में बहुत पसंद आ जाता है। भरत लाल जी अपनी सफेद मूंछों पर हाथ फेरते हुए संतोष से मुस्कुराते हैं।
भरत लाल (गायत्री के दादा जी): "अच्छा त रामदयाल जी, लड़का त बहुत बढ़िया बा। बाकी... अब कुछ लेन-देन के भी बात हो जाए?"
भरत लाल जी के मुँह से 'लेन-देन' का जिक्र निकलते ही ओसारे की हवा थोड़ी गंभीर हो जाती है। माहौल का मिजाज भांपकर बिचौलिए सेठ दशरथ जी अपनी चिर-परिचित मुस्कान के साथ बीच में ही बोल पड़ते हैं।
सेठ दशरथ (हाथ हिलाते हुए): "अरे! रउवा लेन-देन के लेके तनीको चिंता मत करीं भरत लाल जी! पहले मेजर साहब के आपन लड़की त दिखा दीं। लेन-देन के बात त बाद में भी होत रही, उ कहाँ भागल जात बा!"
दशरथ जी इतना कहकर रामदयाल जी की ओर मुखातिब होते हैं और आँख मटकाते हुए पूछते हैं, "का हो दयाल भइया, हम ठीक कहत बानी की ना?"
रामदयाल जी (मेजर साहब): "हाँ-हाँ भाई, काहे ना! बिल्कुल ठीक बात बा। त रउवा सब बताईं की हम कब आईं लड़की देखे खातिर?"
भरत लाल जी (सोच-विचार कर): "ठीक बा, रउवा सब दीपावली के दो दिन बाद सपरिवार आ जाईं। ओही शुभ दिन सब तय कर लिहल जाई।"
रामदयाल जी: "अच्छा ठीक बा, दीपावली के दो दिन बाद ही मुलाकात होई और बात पक्की कइल जाई।"
मेजर साहब रामदयाल जी गहरी संतुष्टि के साथ सिर हिलाते हैं। इसके बाद वे हाथ जोड़कर आदर के साथ राधा मोहन जी और भरत लाल जी के साथ-साथ सेठ दशरथ जी को भी दरवाजे से विदा करते हैं। मेहमानों के जाने के बाद रामदयाल जी की नजरें आँगन में खेल रहे अपने 8 साल के छोटे बेटे रमेश पर पड़ती हैं। उन्हें क्या मालूम था कि आज बड़े बेटे मनोज के लिए जिस रिश्ते की नींव रखी जा रही है, उसकी वजह से आगे चलकर इसी नन्हें रमेश की जिंदगी में 20 साल के कारावास का अंधेरा छाने वाला है।
दृश्य: (बदलता है) राधा मोहन जी के घर का दृश्य, शाम के 5 से 6 बजे का समय।
कलकत्ता से राधा मोहन जी के जीजा साहब, सियाराम जी (लीला के पिता), गायत्री के साथ घर में प्रवेश करते हैं। उनके आने से पूरे घर में खुशियों की एक नई चहक और चहल-पहल दौड़ पड़ती है। शाम ढलते ही राधा मोहन जी, उनके पिता भरत लाल जी, सियाराम जी, उनकी पत्नी और राधा मोहन जी की पत्नी सब एक साथ दालान में बैठते हैं। वहीं पास में राधा मोहन जी की बड़ी लड़की भी शांत खड़ी बड़ों की बातें सुन रही थी।
राधा मोहन जी मुस्कुराते हुए सबको मेजर साहब के बड़े लड़के मनोज को देख आने की खुशखबरी देते हैं। वे बताते हैं कि लड़का बहुत ही सुघड़ और होनहार बा, और लड़के वाले दीपावली के ठीक दो दिन बाद हमारी बिटिया रीता को देखने हमारे यहाँ आ रहे हैं। यह सुनते ही शर्म के मारे उनकी बड़ी लड़की चुपके से वहाँ से उठकर दूसरे कमरे में चली जाती है। घर के सभी बड़े-बुजुर्ग मिलकर भगवान के सामने हाथ जोड़ते हैं कि बच्चों की यह शादी बिना किसी विघ्न के ठीक-ठाक संपन्न हो जाए।
दृश्य: (दीपावली के दो दिन बाद) राधा मोहन जी के घर के सामने का दृश्य।
दीपावली बीत चुकी थी, लेकिन गाँव-जवार में त्योहार की उमंग अभी भी अपनी पूरी रंगत पर थी। आज दूज का शुभ दिन था, इसलिए हर व्यक्ति और मोहल्ले के बच्चों के चेहरे पर एक खास उत्साह और नई चमक दिखाई दे रही थी। हर कोई नए कपड़ों में खुद को सजाए हुए था। लड़कियाँ और औरतें आँगन में बचे हुए दीये जलाने की तैयारी में व्यस्त थीं, तो कुछ बच्चे बचे-खुचे पटाखे और फुलझड़ियाँ जलाने की कोशिश में लगे हुए थे। रह-रहकर आसमान पटाखों की रोशनी से जगमगा उठता था।
तभी घर के सामने पक्के रास्ते पर एक टेम्पू आकर रुकता है। टेम्पू से सेठ दशरथ जी, मेजर रामदयाल जी और 8 साल का नन्हा रमेश अपने पिता जी की उँगली पकड़े हुए उतरते हैं। वादे के मुताबिक, दीपावली के ठीक दो दिन बाद लड़के वालों का यह आगमन हो रहा था। वे सब सीधे कदम बढ़ाते हुए राधा मोहन जी के बैठकखाने (फार्म हाउस का दालान) में पहुँचते हैं।
वहाँ पहले से मौजूद भरत लाल जी (गायत्री के दादा जी) खड़े होकर गर्मजोशी से मेजर साहब और दशरथ जी का स्वागत करते हैं। वे बड़े आदर के साथ सबको कुर्सियों पर बैठाते हैं और तुरंत चाय-पानी तथा ताजे जलपान की मनुहार करने लगते हैं।
बातों-बातों में रात के लगभग 8 से 9 बजे का समय हो चुका था। दालान के अंदर राधा मोहन जी, भरत लाल जी, मेजर साहब और उनके घर के सभी पुरुष सदस्य एक साथ बैठकर हंसी-मजाक कर रहे थे और शादी की रस्मों पर गंभीर चर्चा आगे बढ़ा रहे थे। वहीं दालान के बाहर, पूरे गाँव में दूज के त्योहार की वजह से बम-पटाखों के छूटने की गूँज और लाउडस्पीकर पर बजते गानों की सुरीली आवाजें लगातार सुनाई पड़ रही थीं। इस खुशनुमा उल्लास के बीच, शादी की बात को पक्का करने का यह अहम सिलसिला आगे बढ़ रहा था।
सेठ दशरथ (मुस्कुराते हुए मूंछों पर ताव देते हैं): "अच्छा त राधा मोहन जी, जरा मेजर साहब के घर की लक्ष्मी के भी दर्शन करा दीं! और साथ ही इहो बता दीं की रउवा अपनी इस लक्ष्मी को कितना दान-दहेज देके विदा कर रहल बानी?"
राधा मोहन जी (हाथ जोड़कर आदर से): "ठीक बा दशरथ जी, रउवा सब पहले हमार बिटिया के देख लीं, लेन-देन के बात त होत ही रही।"
इतना कहकर राधा मोहन जी अपने सबसे छोटे भाई को अंदर इशारा करते हैं। कुछ ही देर में उनकी छोटी बिटिया रीता रेशमी साड़ी में, सिर पर मर्यादा का आंचल ओढ़े, संस्कारी कदमों से दालान में प्रवेश करती है। वह धीरे से आगे बढ़कर मेजर साहब और दशरथ जी के पैर छूकर प्रणाम करती है और बड़ों के कहने पर एक तरफ नजरें झुकाकर बैठ जाती है। सादगी, मर्यादा और सुंदरता देखकर मेजर रामदयाल जी का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। लड़का उन्हें पहली ही नजर में अपने मनोज के लिए रीता पसंद आ जाती है ।
रामदयाल जी (मेजर साहब - भावुक होकर): "राधा मोहन भाई जी! लड़की त हमके बहुत संस्कारी और सुंदर लागल। इ त हमरा घर की बहू ना, साक्षात लक्ष्मी ही बन के जाई!"
मेजर साहब जैसी कड़क शख्सियत के मुँह से इतनी बड़ी तारीफ सुनकर वहाँ उपस्थित दोनों परिवारों के सभी सदस्य खुशी से निहाल हो उठते हैं। रामदयाल जी तुरंत अपने कुरते की जेब में हाथ डालते हैं और शगुन के तौर पर ₹101 (एक सौ एक रुपये) निकालकर बड़े दुलार से गायत्री की हथेली पर रख देते हैं।
राधा मोहन जी (मुस्कुराते हुए): "अब तू अंदर जा बेटी।"
रीता उठती है और एक बार फिर लाज-शर्म के साथ मेजर साहब और दशरथ जी को नमस्ते करती है। वह जैसे ही अंदर जाने के लिए मुड़ती है, तभी गायत्री के दादा जी, श्री भरत लाल जी की नजर 8 साल के नन्हें रमेश पर पड़ती है। रमेश मंत्रमुग्ध होकर अपनी होने वाली सुंदर भाभी को एकटक निहार रहा था। दादा जी हँस पड़ते हैं।
भरत लाल जी: "बेटी! तू इनको (रमेश) भी अपने साथे अंदर लेत जा।
रीता शरमाते हुए सिर्फ 'हाँ' में अपना सिर हिलाती है। वह आगे बढ़कर नन्हें रमेश का छोटा सा हाथ अपनी कोमल उँगलियों में थाम लेती है। रमेश भी खुशी-खुशी अपनी होने वाली भाभी की उँगली पकड़े हुए घर के अंदर चला जाता है।
बाहर दालान में, रामदयाल जी, दशरथ जी, राधा मोहन जी और भरत लाल जी सहित परिवार के सभी भाई-बंधु शादी पक्की हो जाने की खुशी में एक-दूसरे को गले लगाकर मुबारकबाद देने लगते हैं। त्योहार के इस पावन दिन को और भी खुशनुमा बनाते हुए वे सब एक-दूसरे का मुँह मीठा कराते हैं, और फिर आराम से बैठकर आगे के लेन-देन (दहेज) की बात को तय करने लगते हैं।
दृश्य: राधा मोहन जी के अंदरूनी घर का दृश्य।
बाहर दालान में रीता की शादी की बातचीत चल रही थी, और इधर अंदर के कमरे में घर की सभी औरतें और लड़कियाँ 8 साल के नन्हें रमेश को बीच में घेरकर बैठी हुई थीं। ग्रामीण परिवेश की औरतें रमेश की मासूमियत को देखकर उससे मीठी ठिठोली करने लगती हैं। उन्हीं में से एक चाची रमेश की गाल थपथपाते हुए मुस्कुराकर पूछती हैं।
चाची (मजाक करते हुए): "का हो बबुआ! तोहार माई भी तोहरे लेखा सुंदर बाड़ी का? की तू केहू और के लइका हवअ?"
चाची की यह बात सुनते ही कमरे में मौजूद सभी औरतें एक साथ ठहाका मारकर हँस पड़ती हैं। रमेश अभी उम्र में छोटा जरूर था, लेकिन वह इतना समझ जाता है कि ये सब उसके साथ मीठा मजाक कर रही हैं। वह बिना झेंपे, अपनी पूरी मासूमियत और रौबदार आवाज में पलटकर जवाब देता है।
नन्हा रमेश: "ना जी! हम त अपनी माई के ही लइका हईं। और हमार माईं त हमसे भी बहुत ज़्यादा सुंदर बाड़ी!"
8 साल के बच्चे के मुँह से अपनी माँ के लिए ऐसा पक्का जवाब सुनकर सभी औरतें एक बार फिर निहाल होकर हँसने लगती हैं और रमेश को दुलारने लगती हैं।
तभी कमरे के लकड़ी के किवाड़ को धकेलते हुए एक छोटी सी, लगभग 6 साल की बेहद प्यारी लड़की अंदर दाखिल होती है। गोल-मटोल चेहरा, आँखों में काजल और दो चोटियाँ गूंथे हुए वह साक्षात गुड़िया जैसी लग रही थी। उसका नाम गायत्री (गीतू) था। वह अपने नन्हें हाथों में एक छोटी सी पीतल की प्लेट लिए हुए थी, जिसमें कुछ घरेलू मिठाइयाँ और दीवाली के बचे हुए छोटे-छोटे पटाखे रखे थे। वह सीधे अपनी माँ के पास जाती है।
नन्ही गायत्री (तुतलाते हुए): "माई... ल, इ इनका दे दअ।"
6 साल की बच्ची को एक अनजान लड़के के लिए इस तरह मिठाई और पटाखे लाते देख कमरे की सभी औरतें हैरान रह जाती हैं। सब की सब निगाहें मुस्कुराते हुए गायत्री पर टिक जाती हैं। बगल में बैठी एक ताई जी ने गायत्री को गोद में उठा लिया और रमेश की तरफ इशारा करते हुए उसे छेड़ने लगीं।
ताई जी: "अरे गीतू! इ के हवन हो? तू इनका खातिर इ सब मिठाई और पटाखा लेके आइल बाड़ू?"
वह छोटी सी गायत्री अपनी तोतली और मखमली आवाज में ताई जी की तरफ देखकर कहती है।
गायत्री: "हाँ चाची! हम दोनों एक साथे बाहर चलके पटाखा जलाईब।"
इतना कहकर वह चाची की गोद से नीचे उतरती है और रमेश के पास जाकर उसकी शर्ट का कोना पकड़कर खींचती है, "चलअ रमेश! बाहर चलके पटाखा छोड़ल जाई।"
रमेश भी मुस्कुराते हुए उसके साथ उठ खड़ा होता है। दोनों बच्चे हाथ में प्लेट लिए घर के बड़े से खुले आँगन में आ जाते हैं। ढलती शाम के सन्नाटे में, दोनों आँगन की मिट्टी पर बैठकर छोटे-छोटे पटाखे, चकरघिन्नी और फुलझड़ियाँ जलाने लगते हैं। पटाखों की हर रोशनी के साथ उनकी मासूम हँसी आँगन में गूँजने लगती है।
बचपन के उस पहले ही दिन, दोनों दो पक्के दोस्तों की तरह एक-दूसरे में पूरी तरह घुल-मिल जाते हैं। पटाखे जलाने के बाद दोनों एक साथ बैठकर प्लेट की मिठाइयाँ खाते हैं और खेलते-खेलते थककर, रात को अंदर कमरे में एक ही बेड पर एक-दूसरे का हाथ थामे बेफिक्री की नींद सो जाते हैं। उन्हें क्या मालूम था कि बचपन की यह मासूम दोस्ती, आगे चलकर जवानी में एक ऐसी बेबाक मोहब्बत का रूप लेगी, जिसके नसीब में सिर्फ जुदाई, आंसू लिखा होगा।
दृश्य: (बदलता है) अप्रैल-मई का महीना। मेजर रामदयाल जी के घर का दृश्य।
शादी का शुभ लग्न आ चुका था। मेजर साहब के घर में शहनाइयाँ गूँज रही थीं और परिवार के सभी सदस्य बारात जाने की तैयारियों में व्यस्त थे। हर कोई नए और कीमती कपड़ों में खुद को सजाने-संवारने में लगा हुआ था। चारों तरफ हल्दी और उबटन की खुशबू फैली थी। घर के मालिक, मेजर रामदयाल जी ओसारे में खड़े होकर अपने दोनों छोटे भाइयों—दीनदयाल और किशनदयाल—को कड़े निर्देश दे रहे थे।
रामदयाल (मेजर साहब): "अरे! तुम दोनों नाँच-पार्टी (नौटंकी) और सामियाना (टेंट) वाले के बयाना (एडवांस) दे देहलू जा की ना? देखअ, मेजर के घर के बारात बा, कौनो कमी ना होखे के चाहीं!"
किशनदयाल (मुस्कुराते हुए ): "हाँ-हाँ भइया! सब एकदम ठीक और तैयार बा, तू तनीको चिंता मत करअ। उ सब अपने आप दम सही टाइम पर लड़की वाले के गाँव पहुँच जइहें।"
दोपहर के लगभग 4 से 5 बजे का समय हो चुका था। साफ़-सुथरे कुर्ते-पायजामे और सिर पर रंग-बिरंगी पगड़ी बांधे सभी बाराती तैयार होकर दरवाजे पर खड़े थे और बारात की गाड़ियों का इंतजार कर रहे थे। थोड़ी ही देर में पक्की सड़क पर धूल उड़ाती हुई गाड़ियाँ आकर रुकती हैं। बारात में जाने का उत्साह ऐसा था कि सब अपनी-अपनी सीट संभालने के लिए गाड़ियों की तरफ लपक पड़ते हैं।
गाड़ियाँ जैसे ही शादी वाले गाँव की तरफ चल पड़ती हैं, उनके लाउडस्पीकर पर उस दौर का सबसे मशहूर गाना गूँजने लगता है—"आए हैं बाराती, बारात लेके... जाएंगे तुझे भी अपने साथ लेके...!" गाड़ियों की खिड़कियों से बाराती हाथ हिलाते हुए गा रहे थे और ८ साल का छोटा रमेश भी खिड़की के पास बैठा इस चहल-पहल को कौतूहल से देख रहा था।
कुछ घंटों के सफर के बाद, गाड़ियाँ 'इटारी' गाँव (गायत्री का गाँव ) के बाहर आकर रुकती हैं। सभी बाराती गाड़ियाँ छोड़ ढोल-नगाड़ों की थाप पर थिरकते हुए उतरते हैं। लड़की वालों ने बारात के स्वागत के लिए गाँव की सरहद पर एक विशाल और रंग-बिरंगा सामियाना सजा रखा था। बाराती जाकर कुर्सियों और गद्दों पर बैठ जाते हैं। वहाँ बारात के मनोरंजन के लिए नौटंकी का मंच सजा था, जहाँ एक नाचने वाली लड़की ढोलक की थाप पर घूंघरू खनकाते हुए पारंपरिक कजरी और पूर्वी गीत गा रही थी—"जियरा तरसे कइसे कटी इ कारी कारी रतिया...!" बाराती वाह-वाह करते हुए पैसे लुटा रहे थे।
रात भर रस्मों-रिवाजों और मंत्रोच्चार के बीच बड़े भाई मनोज और राधा मोहन जी की बड़ी बेटी रीता की शादी की रस्में पूरी होती हैं। सुबह की पहली किरण के साथ, बारात नई नवेली दुल्हन को विदा कराकर वापस अपने गाँव लौट आती है।
दुल्हन के घर की चौखट लांघते ही पूरे घर और मोहल्ले में हर्षोल्लास की एक नई लहर दौड़ जाती है। औरतें मंगल गीत गाती हैं और परछन की रस्म पूरी होती है। घर के आँगन में बड़ी भाभी के रूप में रीता का गृह-प्रवेश हो जाता है और नन्हा रमेश अपनी नई भाभी को देखकर बहुत खुश होता है।
इसके बाद, समय का चक्र अपनी निरंतर और अंतहीन गति से घूमता रहता है। दिन हफ्तों में, हफ्ते महीनों में और महीने सालों में बदलने लगते हैं। शादी का वह शोर-शराबा शांत हो जाता है और सभी लोग धीरे-धीरे अपनी-अपनी पुरानी दिनचर्या और रोजी-रोटी के कामों में दोबारा व्यस्त हो जाते हैं।
दृश्य: समय का चक्र आगे बढ़ता है। शादी के 6 साल बाद का समय।
रमेश के स्कूल में गर्मियों की छुट्टियाँ हो चुकी थीं। उसी दौरान एक बार गायत्री (गीतू) अपनी बड़ी बहन रीता से मिलने रमेश के घर आती है। रमेश के घर का हर सदस्य गायत्री को अपनी ही बेटी की तरह बेहद प्यार करता था। गायत्री का चंचल और सरल स्वभाव ऐसा था कि वह बहुत जल्दी घर के सभी लोगों से घुल-मिल जाती है।
उन दिनों रमेश और गायत्री की उम्र लगभग 14-12 साल की रही होगी। रमेश उम्र में गायत्री से दो साल बड़ा था। देहात (गाँव-जवार) का माहौल होने और साली से हँसी-मजाक करने के पारंपरिक कल्चर (संस्कृति) की वजह से, घर और मोहल्ले के मजाकिया लड़के और गायत्री के रिश्ते में जीजा लगने वाले लोग अक्सर उसे छेड़ते रहते थे। वे सब गायत्री को 'रमेश की घरवाली' कहकर पुकारने लगते हैं।
गायत्री इन बातों का कभी बुरा नहीं मानती थी। जब भी कोई राह चलता उससे चुटकी लेते हुए पूछता—
गाँव के जीजा/लड़के: "का हो गीतू! तोहार दीदी त रमेश के भाभी बाड़ी, बाकी तू केकर मेहरारू (पत्नी) बाड़ू हो?"
तब गायत्री बिना शर्माए, तपाक से अपनी मासूम आवाज में उनको यही जवाब देती—
गायत्री: "हम त रमेश के हईं! और केकर हो सकत बानी!"
कभी-कभी तो यह वाकया सीधे रमेश के सामने ही घट जाता था। गायत्री के मुँह से खुद को अपनी 'घरवाली' सुनना रमेश के बाल-मन को भीतर तक छू जाता था। उसके दिल पर इसका गहरा असर होने लगा। एक दिन जब दोनों आँगन के कोने में अकेले बैठे थे, तो रमेश से रहा नहीं गया। उसने गायत्री से पूछ ही लिया।
रमेश: "गायत्री, तू इ बताव... तू सबके इ काहे कहलू की तू हमार घरवाली हउअ?"
गायत्री (मुस्कुराते हुए चंचलता से): "रमेश, लोग हमसे मजाक करेले त हम एही से कह देनी। बाकी तू बताव... का जब हमार और तोहार शादी होई, त तू हमसे शादी ना करबअ का?"
गायत्री के मुँह से इतनी साफ और मासूम बात सुनकर रमेश का दिल तेजी से धड़कने लगता है। वह गायत्री का हाथ पकड़कर उसे अपने पास बिठाते हुए बड़ी संजीदगी से कहता है।
रमेश: "गीतू, इहाँ आव, बैठ।"
दोनों दालान की सीढ़ी पर साथ बैठ जाते हैं। रमेश उसकी आँखों में झांकते हुए कहता है, "हम तोहसे ही शादी करब गीतू। तू हमके बहुत अच्छी लागेलू।"
रमेश की यह बात सुनकर गायत्री के चेहरे पर सुर्खी छा जाती है। वह सुकून से रमेश के कंधे पर अपना सिर रख लेती है और अपनी आँखें बंद कर लेती है। जवानी की दहलीज़ पर कदम रख रहा और गाने का शौकीन रमेश, अपनी सुरीली आवाज में उसे गुनगुनाकर गाने सुनाने लगता है।
उस पावन दिन के बाद से तो दोनों जैसे एक-दूसरे के बिना रह ही नहीं पाते थे। यूँ कहना बिल्कुल गलत न होगा कि उन दोनों की आत्माएँ साक्षात एक-दूसरे के लिए ही बनी थीं, जो अब हर पल एक-दूसरे के लिए तड़पने लगी थीं। दोनों जैसे-जैसे और जवान होते गए, बचपन की वह मासूम दोस्ती एक बेबाक और गहरे प्यार में बदल गई। दोनों एक-दूसरे से इस कदर मोहब्बत करने लगे कि साथ जीने और साथ ही मरने की कसमें खाने लगे।
हैरानी की बात यह थी कि इस जनम-जनम के पवित्र बंधन और गुप्त प्यार की भनक पूरे परिवार में मात्र रमेश की बड़ी भाभी (रीता) को ही थी। उनके अलावा घर का और कोई सदस्य यह सच नहीं जानता था। सब यही सोचते थे कि बचपन के वो दोनों साथी आज भी बस अच्छे दोस्त भर हैं।
दृश्य: समय का पहिया और आगे घूमता है। रमेश के घर का दालान।
6 साल बाद रमेश के घर में उसकी बड़ी बहन की सगाई (मंगनी) होने वाली थी। इस वक्त तक रमेश और गायत्री, दोनों ही जवानी की दहलीज़ को पूरी तरह पार कर चुके थे। गायत्री की खूबसूरती में तो जैसे चार चाँद लग गए थे। उसका सलोना और सुंदर चेहरा निखरकर पूर्ण रूप से खिले हुए लाल गुलाब के फूल जैसा हो चुका था। उसकी कँवल सी आँखों और ढलती जुल्फों को देखकर उसकी उम्र का हर लड़का एक बार ठंडी आहें भरे बिना नहीं रह पाता था। रमेश भी अपने दिल के उस नायाब गुलाब को बांहों में भरकर जी भर देखना, सहलाना और चूमना चाहता था।
सगाई के इस पावन मौके पर मेजर रामदयाल जी के यहाँ सारे सगे-संबंधी और रिश्तेदार जुटे हुए थे। गायत्री भी अपने पिता राधा मोहन जी और छोटे भाई राजू के साथ इस उत्सव में आई हुई थी। लेकिन रमेश को गायत्री के आ जाने की भनक तक नहीं थी। गायत्री भी जानबूझकर रमेश से नजरें बचाकर, चुपचाप अंदर औरतों के बीच जाकर बैठ गई थी। उसके मन में भी एक प्यारी सी शरारत चल रही थी कि रमेश बेचैन होकर उसे पूरे घर में ढूंढे।
रमेश सुबह से ही सिर्फ और सिर्फ गायत्री के बारे में सोचे जा रहा था। सुबह से लेकर दोपहर बीत गई, पर उसे वो गुलाबी चेहरा कहीं नजर नहीं आया। वह व्याकुल होकर न जाने कितनी बार रसोई के चक्कर काट चुका था और अपनी बड़ी भाभी (रीता) से पूछ चुका था। आखिरकार, बार-बार रमेश को चक्कर काटते देख उसकी भाभी रीता से रहा नहीं गया। वह हाथ में परात लिए मुस्कुराई और उसे छेड़ते हुए बोली।
भाभी (आँख मटकाकर चुटकी लेते हुए): "का बात बा देवर जी! रउवा गीतू के बारे में आज सुबह से ही इतना पूछत बानी? कहीं पीछे-पीछे कोई चक्कर-वक्कर त नइखे बाबू?"
भाभी की यह तीखी बात सुनकर रमेश का गोरा चेहरा लाज से बिल्कुल लाल हो गया। वह नज़रे चुराकर झेंपते हुए बोला।
रमेश (शर्माते हुए): "अरे ना भाभी! अइसन कौनो बात नइखे। हम त बस अइसे ही पूछत बानी की ढलती दोपहर से शाम होखे वाला बा... और अभी तक अपने सब रिश्तेदार लोग ना आइल का?"
रमेश की इस मासूम सी नादान चोरी को भाभी अच्छी तरह पकड़ चुकी थीं। वह मुस्कुराईं और रमेश के कंधे पर हाथ रखकर बड़े लाड से बोलीं।
भाभी: "अरे बबुआ रामू! घर में सब कोई त आ गइल बा... बाकी तोहार उहे 'खास रिश्तेदार' अभी तक लौकत नइखे का?"
भाभी के इस दोतरफा ताने ने रमेश के दिल की धड़कन को और तेज कर दिया। वह समझ गया कि भाभी उसका सारा हाल जानती हैं, पर गायत्री आखिर है कहाँ, यह सस्पेंस अभी भी बरक़रार था।
जबकि रमेश की भाभी रीता को गायत्री के आने का पूरा पता रहता है, पर वे भी थोड़ी मस्ती के मूड में थीं। रमेश का उतरा हुआ चेहरा देखकर वह सचमुच उदास सा हो जाता है। वह जैसे ही मायूस होकर कमरे से जाने के लिए मुड़ता है, उसकी भाभी को उसके मासूम प्यार पर तरस आ जाता है। वह तुरंत आगे बढ़कर रमेश का हाथ पकड़कर रोकती हैं। वे उसे रसोई के दरवाजे की ओट में लाती हैं और आँगन की तरफ इशारा करती हैं, जहाँ औरतों की भीड़ के बीच छुपी बैठी गायत्री सहेलियों से बातें कर रही थी।
भाभी (मुस्कुराते हुए फुसफुसाती हैं): "देखअ रमेश! हमके गीतुआ मना कर देले रहे की हम तोहरा से ओकरा बारे में कुछ न बताईं की उ आ गईल बिया। उ चाहत रहे की तू ओकरा के खोजअ। अब तू जानअ और तोहार गीतू जाने!"
रमेश (मुस्कुराते हुए आँखों में चमक लिए): "अच्छा! त इ बात बा? ठीक बा भौजी, हम ओकरा के कुछ ना बताइब। बाकी हमहू के जब मौका मिली, त हमहू ओकरा के अइवही तड़पाइब, तब ओकरा समझ में आई!"
इतना कहकर रमेश राहत की सांस लेता है। वह ओसारे से रस्सी, बाल्टी और एक पीतल का लोटा उठाता है और गुनगुनाता हुआ कुएं पर नहाने के लिए चला जाता है।
दृश्य: (दूसरे दिन) मेजर रामदयाल जी के घर का आँगन।
अगले ही दिन रमेश की बहन के होने वाले ससुराल पक्ष के लोग अपने कुछ करीबी रिश्तेदारों के साथ मेजर साहब के दरवाजे पर कदम रखते हैं। शंख और घंटी की गूँज के बीच सगाई की रस्म धूमधाम से संपन्न होती है। पंडित जी पंचांग खोलकर बैठते हैं और शुभ मुहूर्त देखकर तिलक, दहेज और बारात का दिन तय कर देते हैं। घर में शादी की शहनाइयाँ बजने का समय तय हो चुका था।
दृश्य: (बारात आने के ठीक एक दिन पहले का समय)
घर का हर कोना मेहमानों और तैयारियों से चहक रहा था। परिवार के सभी लोग खुद को संवारने, उबटन लगाने और निखारने में लगे हुए थे। घर के एक शांत कमरे में रमेश अपनी मेज पर कोयले वाली भारी प्रेस से अपने कपड़े इस्त्री (प्रेस) कर रहा होता है। उसके पास ही मेज पर एक पुराना टेप रिकॉर्डर रखा था, जिसमें उस दौर का बेहद रोमांटिक गाना तेज आवाज में बज रहा था—
"जब दिल ना लगे दिलदार, हमारी गली आ जाना...!"
इधर, आँगन में गायत्री अपनी बड़ी दीदी (रीता) के साथ शादी के कामों में हाथ बंटा रही थी। लेकिन अंदर के कमरे से आ रही टेप रिकॉर्डर की आवाज और रमेश के होने के अहसास ने गायत्री के दिल को बेकाबू कर दिया था। उसका तन भले आँगन में था, पर मन सीधे रमेश के पास खिंचा चला जा रहा था। वह मन ही मन रमेश के पास जाने की कोई तरकीब सोचने लगती है। आखिरकार वह अपनी दीदी की साड़ी का कोना पकड़कर धीरे से कहती है।
गायत्री: "दीदी! रमेश अंदर कमरा में कपड़ा प्रेस करत बाड़न। हमहूँ आपन एगो कपड़ा दे दीं का प्रेस करे खातिर?"
बड़ी दीदी रीता तो अपनी छोटी बहन के दिल का सारा हाल पहले से जानती थीं। वह गायत्री की इस मासूम चोरी को पकड़ लेती हैं और चेहरे पर शरारत भरी मुस्कान लाकर उसे छेड़ते हुए कहती हैं।
दीदी (हंसते हुए): "तू तनीको चिंता मत कर गीतू! आज हम रमेश के पूरे घर के कपड़ा प्रेस करे के दे देले हईं। ओमें तोहार और उनका (मनोज का) भी कपड़ा शामिल बा।"
फिर भी दीदी उसकी बेचैनी देखकर उसे राह देते हुए मुस्कुराकर कहती हैं, "बाकी जा गीतू, जा के देख त! उनका भी मन अकेले कपड़ा प्रेस करे में ना लागत होई। हमारा त डर बा की कहीं उ तोहार ख्यालों में खो के तोहार कीमती कपड़ा ही ना जला देस! या फिर गरम प्रेस के ही तोहार याद में अपना होठों से ना लगा लें!"
दीदी के मुँह से ऐसा मज़ाक सुनकर गायत्री का गोरा चेहरा लाज से बिल्कुल सुर्ख हो जाता है। वह अपनी दीदी को "धत!" कहती हुई झटके से उठती है और आँचल संभालती हुई तेज कदमों से रमेश के कमरे की तरफ भागती है।
कमरे के किवाड़ को थोड़ा ढकेलकर गायत्री दबे पाँव अंदर दाखिल होती है। रमेश पूरे धुन में गाना सुनते हुए प्रेस चला रहा था। गायत्री उसके बिल्कुल करीब पहुँचती है और अपनी खनकती सुरीली आवाज में सीधे गाने की लाइन पर ही वार करती है।
गायत्री (शरारत से मुस्कुराते हुए): "केके अपना गली में बुलावत बाड़अ रमेश?"
गायत्री की अचानक आवाज सुनकर रमेश झटके से पीछे मुड़ता है। दोनों प्रेमियों की नजरें टकराती हैं और कमरे का माहौल एकदम जादुई हो जाता है।
रमेश (मुस्कुराते हुए आँखों में आँखें डालता है): "हम जेकरा के अपनी गली में बुलावत रहनी, उ त आ गईल बा। अब हमके केहू और के जरूरत नइखे!"
रमेश की यह बात सुनकर गायत्री शरमा जाती है। दोनों दुनिया जहान की भीड़ भूलकर, उस एकांत कमरे में मगन होकर प्यार भरी मीठी बातें करने लगते हैं। इसके बाद, दोनों मिलकर घर में शादी के मांडो (मंडप) को सजाने के काम में जुट जाते हैं। दोनों दीवारों पर गेरू और चूने से खूबसूरत चित्रकारी और पारंपरिक नक्काशी करने लगते हैं, जहाँ दीवार पर बने हर बेल-बूटे में उनका छुपा हुआ प्यार छलक रहा था।
दृश्य: (दस दिन बाद) मेजर रामदयाल जी के घर के दरवाजे का दृश्य।
आखिरकार वह शुभ दिन आ ही गया, जब मेजर साहब के दरवाजे पर बारात आकर लगती है। घर का हर सदस्य अपनी-अपनी धुन और काम में लगा हुआ था। रमेश की माँ आँगन में औरतों के साथ मिलकर बारात की अगवानी और पूजा-पाठ की तैयारियों में जुटी थीं। रमेश के पिता, मेजर रामदयाल जी बारात का शानदार स्वागत-सत्कार करने के बाद, बारातियों को जनवासे (ठहरने की जगह) लेकर जाते हैं, जहाँ पहले से ही नाच-गाने की महफ़िल सजी हुई थी।
उस खास दिन गायत्री ने खुद को इस कदर संवार रखा था कि उसके रूप की चमक पूरे आँगन में बिखर रही थी। उसकी जवानी का निखार ऐसा था कि कोई भी हम-उम्र का लड़का उसे देखकर बस ठंडी आहें भरकर ही रह जाता था। रमेश के जिगरी दोस्त तो अब छुप-छुपकर रमेश की किस्मत को सराह रहे थे। तभी रमेश के दोस्तों की टोली में खड़ा 'सेखुआ' नाम का एक लड़का गायत्री के हुस्न पर छींटाकशी करते हुए मजाक की सारी हदें पार कर जाता है।
सेखुआ (शराब के नशे में झूमते हुए): "यार रमेश! तू हमार शादी इस गायत्री से करा द हो। हम कसम खा के कहत बानी, हम दहेज में एको रुपिया ना लेम!"
रमेश का खून खौल उठता है और वह सेखुआ को कुछ कड़ा जवाब देने ही वाला था कि तभी बगल में खड़ा रमेश का चचेरा भाई सुरेश बीच में आ जाता है। वह तमतमाए चेहरे से सेखुआ को चेतावनी देता है।
सुरेश (सख्त आवाज में): "देखअ सेखुआ! दोबारा अब अपनी जुबान से कभी अइसन बात मत निकालिहे! उ राधा मोहन जी के घर से आइल बाड़ी, मेजर साहब के बड़ी बहू की सगी बहन हईं। का उ अइसे ही सड़क पर घूम रहल बाड़ी की कौनो भी ऐरा-गैरा नत्थू-खैरा से उनकर ब्याह हो जाई? अपनी औकात में रह!"
जवानी का अल्हड़ दौर, ऊपर से शादी का माहौल; सेखुआ उस वक्त शराब के नशे में बुरी तरह धुत्त था। उसे सुरेश की यह खरी-खरी बात चुभ जाती है और वह अपनी आँखें तरेरकर सुरेश से सीधे झगड़ा करने पर उतारू हो जाता है। बात गाली-गलौज तक पहुँचती है, तो सुरेश गुस्से में सेखुआ के सीने पर हाथ रखकर उसे पीछे की तरफ एक जोरदार धक्का दे देता है।
मामला बढ़ता देख रमेश तुरंत उन दोनों के बीच में आता है। वह सुरेश का हाथ पकड़ता है और उसे अपने साथ दूर ले जाते हुए शांत करने की कोशिश करता है।
रमेश: "छोड़ द एके सुरेश, इस वक्त इसके मुँह मत लग। इ पूरा पीयले बा, इसे अपनी सुध-बुध ना बा।"
धक्के की वजह से सेखुआ लड़खड़ाकर जमीन पर गिरते-गिरते बचता है। वह खुद को संभालता है और नशे में लाल आँखें निकालकर सुरेश और रमेश दोनों को खुलेआम धमकियाँ देने लगता है।
सेखुआ (उँंगली दिखाते हुए गुर्राता है): "हम तोहरी दोनों के देख लेब सुरेश! और रमेश, तू भी सुन ले... इ तोहार साली बाड़ी न? इ यहाँ अइसे ही सुरक्षित नहीं रह जइहें। हम एकरा के छोड़म ना, देख लेब की तू कइसे बचावत बाड़!"
इतना कहकर वह लड़खड़ाते कदमों से बड़बड़ाता हुआ वहाँ से चला जाता है।
शरीर से बेहद हट्टा-कट्टा और फौजी का बेटा होने के नाते, रमेश सेखुआ जैसी मामूली धमकी से डरने वाला इंसान नहीं था। लेकिन सेखुआ के मुँह से गायत्री को नुकसान पहुँचाने की बात सुनकर, उसके दिल में एक अजीब सी दहशत बैठ जाती है। गायत्री को कुछ हो जाने के ख्याल मात्र से ही उसका पूरा वजूद तड़प उठता है।
तभी उसकी नजर ऊपर छत की तरफ जाती है। गायत्री लाल रंग की साड़ी पहने छत की मुंडेर पर खड़ी होकर नीचे बारातियों की हलचल को देख रही थी। रमेश नीचे खड़ा होकर, अपनी होने वाली दुनिया यानी उस गायत्री को एकटक निहारने लगता है। वह इस डर और प्यार के बवंडर में यह भी भूल जाता है कि बारात की इस भीड़ में उसे और कोई भी देख सकता है।
गायत्री ने उस खास दिन हल्के गुलाबी रंग की एक बेहद खूबसूरत साड़ी पहन रखी थी, जिस पर गाढ़े गुलाबी रंग के सुंदर फूल बने हुए थे। उस लिबास में गायत्री खुद किसी खिले हुए चहकते गुलाब के फूल जैसी लग रही थी। अचानक छत की मुंडेर से गायत्री की नजर नीचे खड़े रमेश पर पड़ी, जो सुध-बुध खोए उसे एकटक निहारे जा रहा था। रमेश को इस तरह सबके सामने दीवाना बना देख गायत्री घबरा गई। वह अपनी बगलें झाँकने लगी कि कहीं बारात की इस भीड़ में कोई और तो रमेश की इस हरकत को नहीं देख रहा है। उसने तुरंत रमेश को आँखों से इशारा किया और संभलती हुई छत से नीचे आ गई।
रमेश भी भीड़ से नजरें बचाकर तुरंत अंदर उसी कमरे की तरफ भागा, जहाँ गायत्री आकर खड़ी हुई थी। रमेश के अंदर कदम रखते ही गायत्री ने दुनिया जहान की परवाह छोड़ तड़पकर उसके गले में अपनी कोमल बांहें डाल दीं और बड़ी आकुलता से पूछने लगी।
गायत्री: "का बात बा रमेश? तू आज हमके सबके सामने अइसे काहे देखत रहल?"
रमेश का दिल अभी भी सेखुआ की धमकी से बैठा हुआ था। वह गायत्री की बांहों को बड़े जतन से अपने गले से निकालता है, उसका चेहरा गंभीर था।
रमेश: "देखअ गीतू... तू सबसे अइसे ही हँस-हँस के मजाक करत रहलू, अब इ सब हमारा अच्छा नहीं लागत बा।"
रमेश के चेहरे पर जलन और फिक्र की लकीरें देख गायत्री मुस्कुरा उठी। वह रमेश की तरफ पलटी और उसकी आँखों में अपनी वफादारी का समंदर उड़ेलते हुए प्यार भरी नजरों से बोली।
गायत्री (धीमी और संजीदा आवाज में): "रमेश, हम जानत बानी की तू हमसे खुद से भी ज्यादा प्यार करलू। लेकिन तू हमरा पर संशय मत करअ। हम त सिर्फ ओही आदमी से मजाक या कोई बात करीला, जो हमको अपना रिश्ता में दिखाई देला। दूसरे गैर मर्दों की तरफ त हम देखना भी पसंद नहीं करीला। हमके तोहार, आपन और इस घर के इज्जत के पूरा ख्याल बा रमेश! लेकिन... हमके कुछ अइसन लागत बा की तू हमसे कुछ छुपा रहल बाड़। काहे से की तू आज से पहले कभी अइसन बात नहीं कइले रहल। सच-सच बताव, का भइल बा?"
गायत्री की इस अटूट निष्ठा को देखकर रमेश पिघल जाता है। वह एक भारी सांस लेता है और कमरे का किवाड़ थोड़ा और सटाते हुए फुसफुसाता है।
रमेश: "गीतू... अभी बाहर हमार सेखुआ से बहुत बड़ा झगड़ा हो गईल रहे।"
गायत्री (आश्चर्य और चिंता से): "काहे? का भइल रहे?"
रमेश: "उ शराब के नशे में तोहरा के उल्टा-सीधा बोलत रहे। जब सुरेश ओकरा के टोकल्क, त उ सीधे हमनी के खुलेआम धमकी देके गइल बा की उ गायत्री के छोड़ी ना! ओकर नजर ठीक नहीं बा गीतू। एह से हम तोहरा से कहत बानी की तू ओकरा से कभी भूलकर भी बात मत करीहअ और कभी भी ओकरा के अपना पास मत आवे दीहअ। अगर कभी उ तोहरा के दूर से भी छेड़े के कोशिश करे, त तू झट से हमको बतइहअ। मतलब तू हमेशा ओकरा से संभल के और बिल्कुल सावधान ही रहिहअ।"
रमेश की आँखों में अपने लिए यह खौफ और शिद्दत देखकर गायत्री का दिल भी एक अनजाने डर से कांप उठता है। कमरे के उस एकांत में बाहर बज रहे लाउडस्पीकर का शोर जैसे किसी आने वाले तूफान की गूंज लगने लगा था।
रमेश (गंभीरता से): "तू जानत बाड़ू की उ एकदम ही कमीना इंसान बा "
गायत्री: "ठीक बा रमेश, हम वैसे भी ओकरा से कभी कोई बात नहीं करीले। बाकी उ अगर हमरा साथे कोई भी बदतमीजी करे के कोशिश करी, त हम खुद ही ओकर चप्पल से हजामत बना देम, तू चिंता मत करअ।"
गायत्री जब रमेश को यह बताती है, तो रमेश थोड़ा खीझ और गुस्से के साथ कहता है।
रमेश: "अरे ना गायत्री! तू अइसन कोई काम ना करबू। ओकरा के सबक हम खुद सीखाइब। तू सिर्फ हमको ओकर हरकत के बारे में बता दीहअ।"
यह कहते हुए रमेश गुस्से में अपने दांत भींचता है और गुर्राते हुए बड़बड़ाता है, "साला...!"
तभी गायत्री उस कमरे के भारी हो चुके वातावरण को खुशनुमा बनाने और अपने और रमेश के बीच के रोमांस को जगाने की कोशिश करती है। वह रमेश के गुस्से को शांत करने के लिए मुस्कुराती है।
गायत्री (लाड़ से): "छोड़अ उ सब रमेश! हमनी खामोखा अपना सर में टेंशन काहे के लेत बानी जा? जब उ अइसन कोई हरकत करी, तब ओकरा के देखल जाई।"
इतना कहकर गायत्री दुनिया जहान की फिक्र छोड़कर आगे बढ़ती है और रमेश को अपनी बांहों में भर लेती है। गायत्री की छुअन मिलते ही रमेश का सारा गुस्सा काफूर हो जाता है। वह भी अपनी बाहें फैलाकर उसे कसकर जकड़ लेता है।
रमेश (गायत्री की आँखों में डूबते हुए): "गीतू... तू आज बहुत ही सुंदर लागत बाड़ू।"
रमेश की आवाज भारी हो जाती है और वह गायत्री के खूबसूरत चेहरे की तरफ धीरे-धीरे झुकने लगता है। रमेश को अपनी ओर करीब आते देख गायत्री लाज के मारे अपनी आँखें बंद कर लेती है। रमेश जब गायत्री के सुंदर चेहरे को देखता है, तो उसे महसूस होता है कि वह जैसे-जैसे उसके होठों के करीब जा रहा है, वैसे-वैसे गायत्री का वह चाँद सा प्यारा मुखड़ा शर्माकर एकदम सुर्ख लाल गुलाब की तरह होता जा रहा है।
गायत्री की तरफ से कोई विरोध न पाकर रमेश इसे उसकी मूक रजामंदी समझ लेता है। आज इतने सालों की अपनी मासूम दोस्ती और गहरे प्यार में पहली बार रमेश आगे बढ़ता है और गायत्री के फूलों की पंखुड़ियों जैसे कोमल होठों को चूम लेता है। समय जैसे एक पल के लिए वहीं ठहर जाता है। कुछ पलों के इस जादुई अहसास के बाद गायत्री धीरे से अपनी आँखें खोलती है और लाज से लाल होकर शर्माती हुई रमेश से कहती है।
गायत्री (लाज से आँखें झुकाते हुए): "रमेश... हम तोहरा से एगो बात पूछल चाहत बानी। आज इतना दिन के बाद तू हमके इतना प्यार के लायक समझलअ? आज तोहरा में इतना हिम्मत कइसे हो गइल?"
गायत्री के इस मासूम सवाल पर रमेश के चेहरे पर एक गहरी और आश्वस्त करने वाली मुस्कान आ जाती है। वह पलक झपकते ही गायत्री को अपनी मजबूत बांहों में ऊपर उठा लेता है।
रमेश (गंभीर और भावुक आवाज में): "गीतू... हम तोहके आपन जिंदगी से भी ज्यादा प्यार करीले। हम अभी तक बस इहे चाहत रहनी की हमनी के प्यार हमेशा गंगा नियर पवित्र रहे। केहू और के नजर में हमनी के प्यार इस रिश्ते के आड़ में खेले वाला कोई खेल ना बन जाए, और कोई हमनी के पवित्र मोहब्बत के गाली ना दे पावे। इहे वजह और इहे सोच के हम तोहरा से हमेशा एक निश्चित दूरी बना के रहे के कोशिश कइनी ह... काहे से की हमके पूरा भरोसा रहे की एक दिन त हमनी के मिलन जरूर होई।"
रमेश की इस पावन सोच को सुनकर गायत्री की आँखों में आदर और अगाध प्रेम के आँसू छलक आते हैं। वह रमेश के सीने पर अपना हाथ रखती है और उसे एक नया और बेहद आत्मीय नाम देते हुए कहती है।
गायत्री: "रमेश, तू हमके हमेशा से ही गायत्री ना कह के 'गीतू' कहेलअ। हमहूँ तोहके आज से सिर्फ 'रामू' कहम!"
अपने जीवन की सबसे बड़ी मोहब्बत से 'रामू' जैसा प्यारा नाम पाकर रमेश का रोम-रोम खिल उठता है। वह बेहद खुश होता है। इसके बाद, दोनों कमरे की ओट से निकलकर वापस बड़े से आँगन में आ जाते हैं।
दृश्य: आँगन में रात का माहौल।
आँगन में गाँव-जवार की औरतें जुट चुकी थीं और शादी के पारंपरिक गीत-संगीत की जोरदार तैयारियाँ चल रही थीं। कोई ओसारे से ढोलक मंगवा रहा था, तो कोई मंजीरा और झाल ढूंढ रहा था। चारों तरफ एक उत्सव का शोर था।
तभी बारात का लाउडस्पीकर वाला लड़का हाथ में माइक उठाए आँगन के बीच आता है। वह उन औरतों में से किसी एक को माइक थमाना चाहता था। लेकिन जैसे ही उसने माइक आगे बढ़ाया, गीत गाने के उत्साह में औरतों के एक साथ दस हाथ ऊपर उठ गए। माइक लेने की इस होड़ को देखकर वह लाउडस्पीकर वाला उलझन में पड़ गया कि आखिर किसके हाथ में माइक थमाए।
तभी वहाँ खड़े रमेश की नजर उस पर पड़ती है। वह आगे बढ़कर उस लड़के के हाथ से माइक ले लेता है। रमेश के मन में चाह थी कि वह यह माइक सीधे अपनी गीतू के हाथों में सौंप दे। वह मुस्कुराते हुए औरतों के उस झुरमुट में अपनी आँखों से गायत्री को ढूंढने लगता है। लेकिन औरतों की उस भारी भीड़ में गायत्री उसे कहीं दिखाई नहीं देती।
रमेश अभी व्याकुल होकर इधर-उधर ताक ही रहा था कि तभी उन औरतों के बीच बैठी, रिश्ते में उसकी एक चुलबुली भाभी उसे देखकर मुस्कुराती हैं और जोर से संबोधित करते हुए कहती हैं।
भाभी (जोर से ठहाका मारते हुए रमेश को चिढ़ाती हैं): "का हो देवर जी! हम सब जानत बानी की तोहार आँखें केकरा के खोज रहल बाड़ी सन!"
इतना कहकर भाभी अपने पीछे घूंघट की ओट में छुपी बैठी गायत्री को मुस्कुराते हुए खींचकर आगे कर देती हैं। सबकी नजरें उन पर टिक जाती हैं। रमेश का दिल तेजी से धड़कने लगता है, वह अपनी नजरें बचाते हुए बड़े दुलार से माइक आगे बढ़ाता है और सीधे गायत्री के हाथों में थमा देता है। गायत्री भी चेहरे पर एक शर्मीली मुस्कान लिए रमेश की आँखों में देखते हुए माइक थाम लेती है।
इसके बाद आँगन में एक जादुई समां बंध जाता है। गायत्री माइक को अपने होठों के करीब लाती है और ढोलक की थाप के साथ शादी के रस्मों में गाए जाने वाले पारंपरिक लोकगीत और सोहर गाना शुरू करती है। उसकी मखमली और सुरीली आवाज जैसे ही लाउडस्पीकर से गूँजती है, पूरे आँगन का शोर एकदम शांत हो जाता है। गायत्री की आवाज में इतनी मिठास और कशिश थी कि वहाँ बैठी गाँव-जवार की सभी औरतें मंत्रमुग्ध होकर उसे सुनने लगती हैं।
उसकी गायकी का जादू ऐसा चला कि कड़क मिजाज की बूढ़ी चाची और ताई भी अपनी दांतों तले उँगलियाँ दबा लेती हैं। जैसे ही गीत खत्म होता है, पूरा आँगन वाह-वाह की गूँज से भर उठता है। वहाँ बैठी हर एक औरत गायत्री को पास बुलाकर चूमने लगती है और उसकी तारीफों के पुल बांधना नहीं भूलती। रमेश दूर खंभे के सहारे खड़ा होकर अपनी गीतू की इस कामयाबी पर मन ही मन फूले नहीं समा रहा था।