सुनैना की प्रतिज्ञा
भाग 1: कलकत्ता का चकाचौंध और बिखरती सादगी
बात 15 मई 1978, दिन सोमवार की है। मेरे पड़ोस से एक भव्य बारात निकली, जो दूर के रिश्ते में मेरे मामा जी के यहाँ जा रही थी। विवाह बड़े धूमधाम से संपन्न हुआ। दुल्हन रिश्ते में मेरी मौसी लगती थीं, जिनका नाम सुनैना था। वह दो भाइयों की इकलौती बहन और सीधे-सादे नन्हकू राम जी की लाडली बेटी थीं। दूल्हा बने रामलाल को पूरा मोहल्ला 'चाचा' कहकर पुकारता था।
विवाह के पश्चात रामलाल अपनी नई-नवेली दुल्हन को लेकर सीधे कलकत्ता (कोलकाता) चले गए। रामलाल को दहेज में 12 कमरों का एक बड़ा हाउसिंग कॉम्प्लेक्स मिला था, जिसमें से 10 कमरे किराए पर उठे हुए थे। उन दिनों चालीस रुपये से लेकर चार सौ रुपये महीने तक का किराया आता था, जिससे पूरे इलाके में रामलाल की धाक थी और लोग उन्हें 'सेठ' कहते थे। रामलाल भी इस रसूख और अमीरी के नशे में फूले नहीं समाते थे।
देहाती और पारंपरिक सामाजिक परिवेश में पली-बढ़ी सुनैना कम पढ़ी-लिखी मगर बेहद सुशील औरत थी। उसे मायके में कलकत्ता का नाम जितना सुहाना लगता था, वहाँ जाकर महानगरीय जीवन उतना ही अजीब लगा। कंक्रीट के जंगलों की भागदौड़ वाली जिंदगी गाँव-देहात की शांत दिनचर्या से बिल्कुल उलट थी। फिर भी सुनैना ने अपनी संस्कृति और धर्म को नहीं छोड़ा। वह शुद्ध शाकाहारी थी, जबकि ससुराल में मांसाहार आम था। वह पूरे मन से सास-ससुर की सेवा करती, मांसाहारी बर्तनों को अलग मांजती, कपड़े धोती और पवित्रता का पालन करते हुए नित्य पूजा-पाठ में लीन रहती।
रामलाल चाहते थे कि उनकी पत्नी भी कलकत्ता की अन्य आधुनिक औरतों की तरह बन-संवर कर चले। उनके रसूख के हिसाब से उनकी पत्नी किसी से कम न लगे और हर महफिल में सब पर भारी पड़े। परंतु सुनैना को सादे लिबास में रहना पसंद था। वह केवल अपनी मर्यादा के लिए मामूली श्रृंगार करती थी। रामलाल ने उसे कई बार बदलने की कोशिश की, मगर सुनैना का यह सादा जीवन अब उन्हें अखरने लगा था। धीरे-धीरे उन्हें अपनी ही पत्नी 'गंवार' लगने लगी। बातों ही बातों में वह सुनैना से चिढ़ने लगे और छोटी-छोटी बातों का बतंगड़ बनाने लगे। यहाँ तक कि एक रात शराब के नशे में उन्होंने सुनैना पर हाथ भी उठा दिया।
भाग 2: मायके की छांव और कलकत्ता का तूफान
पति के इस हिंसक और बेरुखे व्यवहार से आहत सुनैना को अपना मायके याद आने लगा। एक रात जब उसने मायके जाने की इच्छा जताई, तो रामलाल मानो मन ही मन खुश हो गए। उन्होंने उसी वक्त सुनैना से पोटली बांधने को कहा और अगली ही सुबह 12 घंटे का सफर तय कर उसे उसके मायके छोड़ आए। विदाई के वक्त सुनैना दरवाजे की ओट से पति को निहारती रही कि शायद वह एक बार पलट कर देखेंगे, मगर रामलाल बिना पीछे मुड़े चले गए।
कलकत्ता लौटकर रामलाल ने खुद को आजाद महसूस किया। कॉम्प्लेक्स के एक हिस्से में रहने वाले एक बंगाली परिवार की 18 वर्षीय बेटी अनीता के साथ उनकी नजदीकियां बढ़ने लगीं। अनीता खुले विचारों वाली लड़की थी। धीरे-धीरे वह रामलाल के घर का काम संभालने लगी और दोनों अकेले में वक्त बिताने लगे। एक शाम जब रामलाल के माता-पिता घर पर नहीं थे, रामलाल ने अनीता के कमरे में जाकर शराब और कबाब की महफिल सजाई। शराब के नशे और आधुनिकता के इस भंवर में अनीता ने पहली बार रामलाल को 'रामू' कहकर पुकार डाला। उस रात दोनों ने सामाजिक मर्यादाओं की सीमा लांघ दी।
जब रामलाल के पिता को इस अनैतिक संबंध का पता चला, तो उन्होंने कड़े शब्दों में कहा, "तू क्या कर रहा है रामलाल? सुनैना को घर छोड़ आया और अब इस लड़की की जिंदगी बर्बाद करने पर तुला है? तुझे शर्म नहीं आती?"
मगर रामलाल पर कोई असर नहीं हुआ। इसी बीच अनीता गर्भवती हो गई और पूरे मोहल्ले में हंगामा मच गया। सामाजिक और बंगाली समुदाय के दबाव में आकर, अपनी बची-कुची इज्जत बचाने के लिए रामलाल को आनन-फानन में कोर्ट में अनीता से दूसरी शादी करनी पड़ी। मंदिर में फेरों के वक्त रामलाल के बूढ़े पिता की आँखें भर आईं, उन्हें सुनैना की सेवा और पहली शादी का वो सम्मान याद आ रहा था।
मगर रामलाल पर कोई असर नहीं हुआ। इसी बीच अनीता गर्भवती हो गई और पूरे मोहल्ले में हंगामा मच गया। सामाजिक और बंगाली समुदाय के दबाव में आकर, अपनी बची-कुची इज्जत बचाने के लिए रामलाल को आनन-फानन में कोर्ट में अनीता से दूसरी शादी करनी पड़ी। मंदिर में फेरों के वक्त रामलाल के बूढ़े पिता की आँखें भर आईं, उन्हें सुनैना की सेवा और पहली शादी का वो सम्मान याद आ रहा था।
भाग 3: वह मनहूस चिट्ठी और भीष्म प्रतिज्ञा
रामलाल के पिता ने कांपते हाथों से सुनैना को एक पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने रामलाल के कुकर्मों, उसकी दूसरी शादी और होने वाले बच्चे का पूरा सच विस्तार से लिख दिया। उन्होंने अंत में लिखा—"बेटी, तुम बहुत भाग्यशाली और ऊंचे संस्कारों वाली हो। अपनी जिंदगी को एक नई दिशा देने की कोशिश करना और सदैव खुश रहना।"
गाँव में दोपहर के समय सुनैना अपनी गाय को चारा डाल रही थी, तभी डाकिया आया। चिट्ठी मिलते ही सुनैना की खुशी का ठिकाना न था, मगर जैसे-जैसे उसने पत्र की पंक्तियां पढ़ीं, उसके चेहरे का रंग उड़ गया। उसकी बड़ी-बड़ी आँखों से खुशियों के आंसू गहरे दर्द में बदल गए। हाथ से चिट्ठी छूटकर हवा में उड़ गई और उसका बेजान शरीर दीवार के सहारे जमीन पर ढह गया।
वह रोती हुई आंगन में भागी। उसकी माँ ने घबराकर डाके बाबू को बुलाया और पत्र पढ़वाया। जब पूरे गाँव ने रामलाल की करतूत सुनी, तो सबने उसे धिक्कारना शुरू कर दिया। शाम को जब सुनैना की सुध लौटी, तो उसकी आँखों में एक अजीब सा ठहराव था। अगले दिन उसने गंगा स्नान किया, अपनी मांग में गाढ़ा सिंदूर भरा, माथे पर बड़ी सी बिंदी लगाई और पिता से कहा—"चलिए पिता जी, मुझे अभी इसी वक्त कलकत्ता अपने घर जाना है।"
जब सुनैना अपने पिता के साथ कलकत्ता के उस बेड़े (कॉम्प्लेक्स) में पहुँची, तो उसकी सास ने रोते हुए उसे गले से लगा लिया। शोर सुनकर रामलाल भी वहाँ पहुँचे। सुनैना ने रामलाल की आँखों में आँखें डालकर पूछा—"आपने जो कुछ किया, मुझे उससे कोई दुःख नहीं। लेकिन समाज के सामने मेरा क्या अस्तित्व है? मैं किसके सहारे जिऊँगी?"
रामलाल की नजरें झुक गईं। तब सुनैना ने गरजती हुई आवाज में कहा—"एक औरत के सामने जिस पुरुष की नजरें झुक जाएं, जो अपनी पत्नी के सम्मान की रक्षा न कर सके, वह पुरुष मेरी नजरों में इस काबिल ही नहीं कि मेरी जैसी पत्नी उसके पास रहे।"
यह सुनकर सुनैना के पिता का गुस्सा भड़क उठा। उन्होंने चाहा कि वह अपनी लाठी से रामलाल को लहूलुहान कर दें और उसे तड़प-तड़प कर मरने का श्राप दे दें। मगर सुनैना बीच में खड़ी हो गई। उसने हाथ जोड़कर कहा—"नहीं पिता जी! यह जैसे भी हैं, मेरे पति हैं। मेरी मांग में आजीवन इन्हीं के नाम का सिंदूर रहेगा। मैं किसी हाड़-मांस के पुतले की नहीं, बल्कि विवाह के उन पवित्र मंत्रों और अग्नि के सात फेरों की इज्जत रखना चाहती हूँ। चलिए, इन्हें इनके हाल पर छोड़िए।"
चौखट को प्रणाम कर सुनैना हमेशा के लिए लौट आई। उसने अपने चेहरे पर एक बनावटी खुशी का मुखौटा पहन लिया ताकि उसके बूढ़े माता-पिता को उसकी तड़प न दिखे। कुछ समय बाद इसी सदमे में उसकी माँ का देहांत हो गया और पिता ने अपनी लाज रखने वाली बेटी के नाम दो बीघा जमीन कर दी।
भाग 4: नियति का न्याय और दशहरे का मेला
इधर कलकत्ता में नियति ने अपना क्रूर खेल शुरू किया। अनीता से रामलाल को तीन बेटियां हुईं। बेटे की चाहत में रामलाल ने शराब-कबाब तक छोड़ दिया। मन्नतें पूरी हुईं और अनीता ने जुड़वां बेटों को जन्म दिया। घर में खुशियां तो आईं, मगर रामलाल दोबारा शराब के दलदल में डूब गए। शराब के इस दौर ने उनके माता-पिता को जीते जी मार डाला और दोनों एक-एक कर परलोक सिधार गए।
विपत्ति यहीं नहीं रुकी। जब जुड़वां बेटे महज चार साल के थे, एक सड़क हादसे में अनीता की मौत हो गई। रामलाल पांच अनाथ बच्चों के साथ अकेले रह गए। मौका पाकर कॉम्प्लेक्स के पुराने बंगाली किरायेदारों ने मकान पर अपना दावा ठोक दिया। कानूनी दांव-पेंच में हारकर रामलाल को अपना सब कुछ औने-पौने दाम में बेचना पड़ा और वह बच्चों को लेकर वापस गाँव आ गए।
गाँव में काम न होने के कारण रामलाल पूरी तरह अवसाद (Depression) में डूब गए। वह दिन-रात शराब में धुत्त रहने लगे। अनाथ बच्चे भूख से बिलखते रहते। गाँव के लोगों ने जब यह हालत देखी, तो किसी ने कानाफूसी की—"रामलाल, अगर बच्चों को बचाना है तो सुनैना के पैरों में गिर जाओ, वही इन बच्चों को माँ की ममता दे सकती है।" सुनैना का नाम सुनते ही रामलाल के भीतर का सोया हुआ मुजरिम जाग उठा।
दशहरे का दिन था। चारों तरफ लाउडस्पीकर पर गाने बज रहे थे, मेला लगा था। उस सुबह रामलाल ने शराब नहीं पी। उन्होंने अपने पाँचों बच्चों को नहलाया, मेले से उनके लिए नए कपड़े, जूते और मिठाइयां खरीदीं। बच्चों के मुरझाए चेहरों पर पहली बार मुस्कान खिली थी। रामलाल ने अपने सबसे छोटे बेटे को गोद में उठाकर सीने से भींच लिया। उस पल उस सफर में रामलाल को पहली बार 'पितृत्व' और 'माँ की ममता' दोनों का एक साथ अहसास हुआ। उन्हें समझ आया कि बच्चों के स्वच्छ मन में ही परमेश्वर वास करता है।
भारी कदमों से, अपनी जिल्लत का पिटारा सिर पर उठाए, रामलाल बच्चों को लेकर सीधे सुनैना के घर की ओर चल पड़े। वह मन ही मन बुदबुदा रहे थे—"सुनैना, मैं तुम्हारा गुनाहगार हूँ। तुम जो सजा दोगी, मैं भुगतूंगा। बस मेरे इन मासूम बच्चों को संभाल लो।"
शाम के धुंधलके में जब रामलाल बच्चों के साथ सुनैना के दरवाजे पर पहुँचे, तो चौपाल पर बैठे युवक ने पूछा, "किससे मिलना है?"
रामलाल ने कांपती आवाज में कहा, "मैं रामलाल हूँ... नन्हकू राम जी के परिवार से मिलना है।"
वह युवक सुनैना का छोटा भाई लक्ष्मण था। वह रामलाल को पहचान गया और आदर से उन्हें चारपाई पर बैठाकर अंदर चला गया।
रामलाल ने कांपती आवाज में कहा, "मैं रामलाल हूँ... नन्हकू राम जी के परिवार से मिलना है।"
वह युवक सुनैना का छोटा भाई लक्ष्मण था। वह रामलाल को पहचान गया और आदर से उन्हें चारपाई पर बैठाकर अंदर चला गया।
अंदर आंगन में, दीये की टिमटिमाती रोशनी में सुनैना हँसिये से सब्जी काट रही थी। जब लक्ष्मण ने आकर कहा कि बाहर जीजा जी अपने पाँच बच्चों के साथ आए हैं, तो सुनैना के हाथ पल भर के लिए ठहर गए। उसके शांत स्वभाव में एक गहरी अशांति फैल गई। उसने खिड़की की ओट से बाहर देखा—सामने फटेहाल, पश्चाताप की आग में जल रहा उसका पति और भूख-प्यास से थके पाँच मासूम बच्चे बैठे थे।
सुनैना की मांग का सिंदूर और उसकी भीष्म प्रतिज्ञा आज समाज के सामने एक नई परीक्षा के रूप में खड़ी थी। क्या वह उन मासूम बच्चों के लिए अपने अतीत के जख्मों को भुला पाएगी?
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