इंसान
कितना बेवकूफ है,
उसका
दिमाग भी क्या खूब है,
सोचता
है धरती का खुदा हूँ मैं,
खुदा
भी खुद की जायदाद है।
अजायब,
मंदिर बना कर समझे,
दिया
है घर ऊपर वाले को हमने,
धर्म
के तराजू में तौलकर बांटे,
इष्ट
भी अपना अलग अलग है छांटे I
ये
वहम में जीता है हर पल,
मुट्ठी
में है उसके आने वाला कल,
हवा
का रुख बदलने की जिद है,
पर
अपनी ही सांसों से नाउम्मीद है।
ऊंचे
महलों में तकदीर ढूंढता है,
कांच
के घरों में वजूद ढूंढता है,
मिट्टी
का है, मिट्टी में ही मिलेगा,
न
जाने किस बात का गुरूर है।
चाँद-सितारों
पर पैर तो रख दिए,
अपनों
के दिलों से फासले कर लिए,
उद्भव
की रोशनी में अंधा हुआ ऐसा,
खुद
को ही खुद से जुदा कर लिए।
अहम
में आसमां को आंकता है,
दो
गज जमीं को कहाँ ताकता है,
कुदरत
के इशारे को खेल समझ बैठा,
कागज
के सिक्कों पे ईमान बेचता है।
मशीनों
की बस्ती में खो गया है इंसान,
भूल
गया इंसान को ही इंशान ,
जीतने
चला है ब्रह्मांड के रहस्य,
पर
ब्रह्म को दिया पद हास्य।
दौलत
को तकिया बनाता है,
सुकून
बेचकर जो आराम कमाता है,
मौत
की दस्तक का होश खोकर,
लम्बा
जीवन का इंतजाम करता है।
खिलौना
समझकर खेला हर रिश्ते से,
तनहा
खड़ा है वो वक्त के रास्ते पे,
हैरान
है देखकर अपनी ये हालत,
सब
कुछ पाकर गया खाली हाथ ।
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