Wednesday, 1 July 2026

सुनैना की प्रतिष्ठा और प्रतिज्ञा (पटकथा)

 कहानी: सुनैना की प्रतिज्ञा 

दृश्य 1. 15 मई 1978, दिन सोमवार। स्थान: लेखक का पड़ोस 
उस दिन सोमवार था और तारीख थी 15 मई 1978। सुबह से तपती दुपहरिया और अब शाम की ठंडी हवाएं चलने लगीं पुरे दिन ही मेरे पड़ोस में एक अजीब सी हलचल और रौनक छाई रही। लाउडस्पीकर पर शहनाई के सुर गूँज रहे थे और पूरा मोहल्ला रंग-बिरंगे कागज़ के झंडों से सजा हुआ था। उस दिन मेरे पड़ोस से एक बारात निकलने वाली थी। बारात सीधा संबंध मेरे ननिहाल से था। यह बारात मेरे मामा जी के दूर के रिश्ते में जा रही थी।
शादी का माहौल बेहद धूमधाम से भरा था। दूल्हा बने रामलाल जी सज-धजकर तैयार थे, जिन्हें हम सब मोहल्ले वाले बच्चे काका कहकर पुकारते थे। रामलाल काका के चेहरे पर एक अनोखा रौब और शादी की खुशी साफ़ झलक रही थी। बाजे-गाजे और बारातियों के पूरे ठाठ-बाठ के साथ यह बारात अपनी मंजिल की ओर रवाना हुई।

दृश्य 2. समय: उसी रात। स्थान: सुनैना का पैतृक घर मेरा ननिहाल 
बारात जब अपनी मंजिल पर पहुँची, तो वहाँ स्वागत-सत्कार में कोई कमी नहीं छोड़ी गई थी। चारों तरफ पैट्रोमैक्स की रोशनी बिखरी थी और मंडप को कागज के फूलों से बेहद खूबसूरती से सजाया गया था। जिस लड़की से रामलाल काका की शादी हो रही थी, उनका नाम सुनैना था। सुनैना जी रिश्ते में मेरी मौसी लगती हैं। मंडप के एक कोने में सीधे-साधे स्वभाव के झलक सिंह जी खड़े थे, जो सुनैना मौसी के पिता थे। उनके पास ही सुनैना मौसी के दो छोटे भाई भी बड़ी उत्सुकता से शादी की रस्में देख रहे थे।
रात भर चले रस्मों-रिवाजों, मंत्रोच्चार और बड़ों के आशीर्वाद के बीच शादी की रस्में बहुत ही धूमधाम से संपन्न हुईं। अग्नि को साक्षी मानकर रामलाल चाचा और सुनैना मौसी हमेशा-हमेशा के लिए एक-दूसरे के पवित्र बंधन में बंध गए। सुबह की पहली किरण के साथ ही विदाई का भावुक पल भी आ गया। विदाई की रस्म पूरी हुई और दुल्हन बनीं सुनैना मौसी बारात के साथ खुशी-खुशी विदा हो गईं।

दृश्य 3. समय: शादी के कुछ दिन बाद। स्थान: रामलाल जी का हाउसिंग कॉम्प्लेक्स, कलकत्ता 
शादी के सारे रीति-रिवाज खत्म होने के बाद, मेरे दूल्हा बने रामलाल चाचा अपनी नई नवेली दुल्हन सुनैना मौसी को लेकर सीधा कलकत्ता चले गए। कलकत्ता, जो उन दिनों बिहार वासियों के लिए अपनी रईसी और बड़ी-बड़ी इमारतों के लिए जाना जाता था, वहाँ रामलाल चाचा का अपना एक अलग ही रुतबा था। असल में, कलकत्ता के एक बेहतरीन इलाके में उनका एक विशाल हाउसिंग कॉम्प्लेक्स था, जिसमें पूरे 12 कमरे बने हुए थे। यह 12 कमरों का आलीशान कॉम्प्लेक्स रामलाल जी के पिता जी को कभी शादी में दहेज के रूप में मिला था, जो अब रामलाल जी के हिस्से में आ चुका था।
इस विशाल इमारत के 12 कमरों में से उन्होंने 10 कमरे किराए पर दे रखे थे, जबकि बाकी एक रूम में रामलाल के माँ बाप और एक कमरे में वे खुद अपनी गृहस्थी बसाने की तैयारी कर रहे थे।

दृश्य 4. समय: शाम का समय। स्थान: कलकत्ता का वो मोहल्ला
उन दिनों उस पूरे मोहल्ले और आसपास के इलाके में रामलाल जी की अपनी एक अलग ही धाक और साख थी। रास्ते से गुजरते समय हर छोटा-बड़ा इंसान उंन्हे बड़े आदर के साथ 'सेठ' कहकर पुकारा करता था। और सच कहें तो लोग उंन्हे सेठ कहे भी क्युँ ना! उन दिनों के हिसाब से उनकी आमदनी इतनी तगड़ी थी कि कोई भी दंग रह जाए। उन दिनों जब एक कमरे का महीना मात्र 40/- रुपये हुआ करता था, तब रामलाल जी को अपने 10 कमरों से हर महीने पूरे 400/- रुपये का बंधा-बंधाया किराया मिलता था उनके पिता जी को कुछ पेंशन भी मिला करती थी 
सन 1978 के उस दौर में 400/- रुपये महीने की कमाई होना एक बहुत बड़ी और रईसी की बात मानी जाती थी। यही वजह थी कि उस पूरे एरिया के बड़े-बड़े रसूखदारों और रईसों में रामलाल जी की गिनती की जाती थी। जब भी कोई उंन्हे राह चलते 'सेठ जी' कहकर प्रणाम करता, तो रामलाल जी अपने आप को सेठ कहलाने से भीतर ही भीतर फूले नहीं समाते थे और बड़े गर्व से अपनी मूंछों पर ताव देकर आगे बढ़ जाते थे।

दृश्य 5. समय: सुबह का समय। स्थान: कलकत्ता का वो मकान
मौसी से चाची बनी सुनैना पूरी तरह से एक देहाती सामाजिक परिवेश में पली-बढ़ी, कम पढ़ी-लिखी और बेहद सुशील औरत थीं। गाँव की मिट्टी की सोंधी खुशबू के साथ साथ वहाँ की सादगी उनके रग-रग में बसी थी। शादी से पहले उन्होंने कलकत्ता का नाम जितना सुहाना और जादुई सुना था, वहाँ जाकर उन्हें यह शहर उतना अच्छा नहीं लगा। चारों तरफ गाड़ियों का शोर, कंक्रीट के ऊंचे मकान और सुबह से शाम तक लोगों की भाग-दौड़ वाली जिंदगी उन्हें भीतर से परेशान कर देती थी। गाँव-देहात के शांत माहौल से बिल्कुल हटकर, इस शहर की अजीब और उटपटांग सी जीवनचर्या सुनैना को किसी दूसरी दुनिया जैसी लगती थी, जहाँ ठहरने का किसी के पास वक्त नहीं था।

दृश्य 6. समय: दोपहर का समय। स्थान: घर की रसोई और आँगन
इन सब अजनबी बदलावों के बावजूद सुनैना अपने पारिवारिक संस्कारों और धर्म को कभी नहीं भूलीं। उन्होंने अपने सास-ससुर की सेवा और पत्नी धर्म को निभाने में कोई कोताही नहीं बरती। खुद शुद्ध शाकाहारी रहते हुए भी सुनैना ने ससुराल के मांसाहारी परिवार के साथ जीना पूरी सहजता से स्वीकार कर लिया था। वे बिना किसी शिकायत के मांसाहार खाने वाले घरवालों के जूठे बर्तन माँजतीं, उनके कपड़े धोतीं और इन सब के बीच खुद को हमेशा शुद्ध और पवित्र रखते हुए नियम से नित्य पूजा-पाठ भी किया करती थीं। उनकी निष्ठा और सेवा भाव को देखकर घर के बड़े-बूढ़े भी मन ही मन उनके संस्कारों का आदर करते थे।

दृश्य 7. समय: इतवार (रविवार) की शाम। स्थान: रामलाल जी के घर का बैठकखाना
सुनैना को हिंदी फिल्मों के सुरीले गाने सुनना बेहद अच्छा लगता था, उनकी धुनें मन को सुकून देती थीं। लेकिन हर इतवार को या किसी पर्व-त्योहार के मौके पर जब घर के लोग टेलीविजन या रेडियो चालू करते, तो वहाँ का नजारा देख सुनैना को बड़ा अचम्भा सा लगता था। उन गानों पर फिल्मी लोगों जैसे चमकीले कपड़ों में औरत और मर्द को एक साथ हिलते-हिलाते और नाचते देख वे हैरान रह जाती थीं।
सबसे ज्यादा अजीब तो उन्हें तब लगता, जब उनके अपने ही घर में, पड़ोस और रिश्तेदारी के औरत-मर्द एक साथ इकट्ठा हो जाते। वे लोग अपने ही माँ-बाप, बड़े-बूढ़ों और छोटे बच्चों के सामने खुलेआम नाचने लगते थे। उन बड़ों और बच्चों के सामने इस तरह नाचना और नाचने के साथ-साथ शराब पीकर झूमना-कूदना सुनैना को बहुत ही अजीब और मर्यादा के खिलाफ लगता था। वे घूंघट की ओट से यह सब देखतीं और चुपचाप अपनी रसोई की तरफ लौट जाती थीं, जहाँ उनका अपना सीधा-सादा संसार था।

दृश्य 8. समय: दोपहर का समय। स्थान: हाउसिंग कॉम्प्लेक्स का अहाता और रसोई
कलकत्ता की उस बड़ी सी इमारत यानी बाड़ी के एक कमरे में रामलाल अपनी पत्नी सुनैना के साथ रहा करते थे। वहीं दूसरा कमरा उन्होंने शादी से ठीक पहले अपने गाँव से आने वाले माँ-बाप के रहने के लिए खाली करवा लिया था। उस हाउसिंग कॉम्प्लेक्स में रहने वाले किरायेदार सब के सब बंगाली थे। रोज़ सुबह-शाम उन बंगाली किरायेदारों के घरों में पकने वाले मांस और मछली की तीखी गंध पूरे गलियारे में फैल जाती, जो शुद्ध शाकाहारी और पारंपरिक माहौल में पली-बढ़ी सुनैना के लिए पूरी तरह असहनीय हो जाती थी। वे उस गंध से बचने के लिए अपनी रसोई की खिड़कियाँ बंद कर लेतीं और ईश्वर का नाम जपने लगती थीं।

दृश्य 9. समय: रविवार की रात। स्थान: रामलाल जी के घर का बैठकखाना 
पर्व-त्योहार या इतवार की ऐसी ही एक महफ़िल में जब घर के भीतर शराब और नाच-गाने का दौर चल रहा था, तो रामलाल ने घूंघट काढ़े खड़ी सुनैना को टोक दिया, "अरे देख, सब नाच रहे हैं, तू क्यों शर्मा रही है?" रामलाल के मुँह से सबके सामने यह बात सुनते ही सुनैना मारे शर्म के जैसे जमीन में गड़ जाती थीं। वे बिना कुछ बोले, चुपचाप अपनी नजरें झुकाए वहाँ से हट जातीं और घर के किसी अंधेरे कोने या कमरे में जाकर छुप जाया करती थीं। अपनी पत्नी को इस तरह भागते देख रामलाल सबके सामने बस अपना मुँह बिचका कर रह जाते, उन्हें लगता कि सुनैना ने उनका रसूख कम कर दिया है।

दृश्य 10. समय: सुबह का समय। स्थान: रामलाल का कमरा 
दरअसल, रामलाल की चाहत थी कि उनकी पत्नी भी शहर के दूसरे आधुनिक लोगों की तरह रहे। वह भी सबकी तरह बन-संवर कर चले और अंग्रेजी तौर-तरीके सीखे। रामलाल का मानना था कि मोहल्ले और इलाके में उनके जो रसूख और धाक है, उसके हिसाब से उनकी पत्नी भी किसी से कम नहीं दिखनी चाहिए, बल्कि हर मामले में बाकी सबकी पत्नियों पर भारी पड़नी चाहिए। परन्तु सुनैना को तो हमेशा से ही सादे लिबास में रहना पसंद था। वे दिखावे के सख्त खिलाफ थीं और श्रृंगार तो केवल अपनी बहुत जरूरी पूजा-पाठ या विशेष अवसरों पर ही किया करती थीं।

दृश्य 11. समय: रात का समय। स्थान: रामलाल का कमरा
रामलाल सुनैना को आधुनिक बनने और सजने-संवरने के बारे में काफी कुछ समझा-बुझा चुके थे, लेकिन सुनैना अपने संस्कारों को छोड़ने को तैयार नहीं थीं। रामलाल को अब अपनी पत्नी का यह सादा लिबास और सादा जीवन यापन बिल्कुल भी अच्छा नहीं लग रहा था। उनके भीतर का अवांछित अहंकार इस कदर बढ़ गया था कि उन्हें अब अपनी ही सुशील पत्नी सुनैना 'गंवार' लगने लगी थी। वे बातों ही बातों में सुनैना से चिढ़ने लगे थे और घर में छोटी-छोटी बातों का बतंगड़ बनाने लगे थे। हर रोज़ कोई न कोई ताना देना रामलाल की आदत बन चुका था। और फिर एक अनहोनी रात को, जब रामलाल पूरी तरह शराब के नशे में धुत्त होकर घर लौटे, तो मामूली बहस में उन्होंने अपना आपा खो दिया और पहली बार मासूम सुनैना पर हाथ भी उठा दिया।
दृश्य 12. समय: रात का समय। स्थान: रामलाल का बेडरूम
रामलाल का हर रोज़ का यही नियम बन चुका था। वह रात को देर से घर लौटता, शराब के नशे की तेज बदबू के साथ बिस्तर पर आता और बिना किसी भावनात्मक जुड़ाव के सुनैना पर अपने पति होने का हक जताता। इसके ठीक बाद वह एक ओर मुँह फेरकर गहरी नींद में निढाल पड़ जाता। सुनैना भी सुबह से लेकर रात तक के घर के भारी और थका देने वाले कामों से पूरी तरह चूर रहती थीं, इसलिए वे भी इस सूनेपन के बीच ना चाहते हुए नींद की आगोश में चली जाती थीं। रामलाल के इस रूखे व्यवहार से सुनैना भीतर से बेहद अकेली हो गई थीं। उन्हें हर पल अपना वही पुराना, शांत और प्यार से भरा मायके का घर बहुत याद आने लगा था।

दृश्य 13. समय: रात के भोजन का समय। स्थान: घर 
एक दिन रात के खाने के समय, जब सुनैना रामलाल को थाली परोस रही थीं, तो उन्होंने दबी हुई आवाज़ में अपने दिल की बात सामने रखी। उन्होंने रामलाल से बस यूँ ही कुछ दिनों के लिए अपने मायके जाने का ज़िक्र छेड़ दिया। सुनैना की बात सुनते ही रामलाल सहर्ष मान गए, मानो उनके मन की कोई बहुत बड़ी मुराद पूरी हो गई हो। एक पल भी नहीं सोचा और उसी रात सुनैना से कड़क आवाज़ में कहा कि वह अपने सारे कपड़े तुरंत एक थैले में डाल ले।
भोजन की थाली में हाथ धोते हुए रामलाल रूखेपन से बोला, "मैं सुबह ही तुम्हें तुम्हारे घर छोड़ आऊँगा, तुम पूरी तरह तैयार रहना।"

दृश्य 14. समय: देर रात का समय। स्थान: रामलाल का कमरा
सुनैना को अपने पति रामलाल के इस झटकेदार व्यवहार और इतनी जल्दी मायके भेजने के लिए तैयार हो जाने की कतई उम्मीद नहीं थी। पर कड़वा सच उनके ठीक सामने खड़ा था। असल में सुनैना अपने पति, ससुराल और बूढ़े सास-ससुर को छोड़कर कहीं जाना नहीं चाहती थीं। उन्होंने तो बस यूँ ही रामलाल के मन की बात को टटोलना चाहा था कि क्या उनके मायके जाने की बात सुनकर पति का दिल थोड़ा पिघलेगा या वह उन्हें रोकेगा। लेकिन रामलाल की इस जल्दबाज़ी ने उनका दिल अंदर तक तोड़ दिया। वे भारी मन से लालटेन की मद्धम रोशनी में बैठ गईं और आंसुओं को छुपाते हुए अपने कपड़े थैले में सहेजने लगीं, यह सोचकर कि कल सुबह उसकी तकदीर उसे वापस कहाँ ले जाने वाली है?

दृश्य 15. समय: देर रात का समय। स्थान: रामलाल का बेडरूम
उस रात रामलाल सुनैना से आगे कुछ भी बोले नहीं और हमेशा की तरह एक तरफ मुँह फेरकर बेफिक्री से सो गए। इधर सुनैना की आँखों की नींद उनसे कोसों दूर खड़ी मानो सारी रात उन्हें चिढ़ाती रही। वे बिस्तर पर लेटी-लेटी एकटक अपने सोते हुए पति के चेहरे को निहारती रहीं। उनके मन का उद्वेग ऐसा था कि वे कभी घबराकर बिस्तर पर उठकर बैठ जातीं और दिल के किसी कोने में उम्मीद पाल लेतीं कि शायद रामलाल अभी जागेंगे, उनकी तरफ देखेंगे और उन्हें मायके न जाने के लिए ज़िद करके रोक लेंगे।
कभी उनके मन में आता कि वे रामलाल को झकझोर कर जगा दें और सीधे उनकी आँखों में आँखें डालकर पूछें कि "आखिर मैं उन्हें पसंद क्यों नहीं हूँ? काश मैं भी उतनी ही आधुनिक होती ताकि वे मुझे अपने साथ हर जगह ले जाते!" लेकिन अगले ही पल रामलाल के उसी पुराने बेरूत और कड़क स्वभाव के बारे में सोचकर वे सहम जातीं और कदम पीछे खींच लेतीं। रात के सन्नाटे में जब कभी रामलाल नींद में करवट बदलता, तो सुनैना डरकर धीरे से वापस बिस्तर पर लेट जातीं और अपनी व्याकुलता को दबाने के लिए छत पर लटके पंखे के नाचते हुए परों को गिनने की नाकाम कोशिश करने लग जाती।

दृश्य 16. समय: सुबह का समय। स्थान: रामलाल का घर और अहाता
पंखे के परों को गिनने की सुनैना की इन्हीं नाकाम कोशिशों के साथ आख़िरकार सुबह हो गई। भोर होते ही खिड़की के बाहर चिड़ियों के चहचहाने की आवाज़ आने लगी, लेकिन उस आवाज़ के साथ सुनैना के दिल की धड़कन भी लगातार बढ़ती चली जा रही थी। वे भीतर से अच्छी तरह समझ गई थीं कि रामलाल की जो ज़िद है, उसकी वजह से वह आज उन्हें मायके छोड़ने ज़रूर ले जाएगा। और आख़िरकार हुआ भी यही।
घर के दालान में रामलाल के बूढ़े माता-पिता ने जब बहू के हाथ में थैला देखा, तो वे रामलाल पर बरस पड़े। उन्होंने रामलाल को रोकने की लाख कोशिशें कीं और बहुत मना किया, लेकिन रामलाल अपनी ज़िद पर अड़ा रहा। उसने अपने माता-पिता के सामने यही बहाना बनाया कि सुनैना पिछले छह महीनों से अपने माँ-बाप से दूर है और उसे उनकी बहुत याद आ रही है। साथ ही, उसने बड़ों को तसल्ली देते हुए यह झूठा वादा भी किया कि वह सुनैना को बहुत जल्द वापस लिवा लाएगा। इतना कहते ही रामलाल ने भारी मन से खड़े सुनैना के कपड़ों का थैला अपने हाथ में उठा लिया।

दृश्य 17. समय: सुबह का समय। स्थान: घर का मुख्य दरवाज़ा
जाने का वक़्त आ चुका था। सुनैना बेहद भारी मन और डबडबाई आँखों के साथ अपने सास-ससुर के पैर छूकर आशीर्वाद लेने गईं। उन दोनों की बूढ़ी और तजुर्बेकार आँखें सुनैना के नयनों में साफ़ झलकते उसके दिल के गहरे दर्द और बेबसी को देख चुकी थीं। वे जानते थे कि उनकी सुशील बहू इस घर से जाना नहीं चाहती, लेकिन वे अपने इकलौते बेटे की इस अवांछित ज़िद के आगे पूरी तरह मजबूर थे। सास-ससुर ने भारी मन से बहू के सिर पर हाथ रखा और दोनों चुपचाप आँसू पोंछने लगे। रामलाल थैला टाँगे आगे बढ़ गया और सुनैना आँचल का घूंघट संभाले उसके पीछे-पीछे चल पड़ीं।

दृश्य 18. समय: शाम का समय। स्थान: सुनैना का पैतृक घर (मायके का दरवाज़ा)
लंबा सफ़र तय करके जब दोनों सुनैना के मायके पहुँचे, तो बेटी को अचानक इस तरह आया देख झलक सिंह जी और उनका पूरा परिवार अचंभित रह गया। रामलाल का रवैया यहाँ भी बेहद रूखा और संवेदनहीन था। वह सुनैना को वहाँ छोड़कर उसी दिन तुरंत वापस कलकत्ता जाने के लिए तैयार हो गए  सुनैना के माता-पिता और दोनों छोटे भाइयों ने हाथ जोड़कर रामलाल से रात रुक जाने का लाख अनुरोध किया, उनके मान-मनौव्वल के आगे भी वह एक पल के लिए नहीं रुके। वह पैर छूकर तुरंत पलटे और तेज़ कदमों से रास्ते की तरफ बढ़ गए।
दुल्हन के लिबास में खड़ी सुनैना घर के मुख्य दरवाज़े की ओट में छुपकर रोती हुई आँखों से अपने जाते हुए पति को एकटक निहारती रहीं। उनके दिल में अब भी एक आखिरी उम्मीद बची थी, वे मन ही मन सोच रही थीं कि शायद रामलाल दूर जाने से पहले कम से कम एक बार पलट कर उनकी तरफ ज़रूर देखेगा। लेकिन रामलाल बिना पीछे मुड़े सीधे रास्ते पर आगे बढ़ गय और सुनैना की वह आखिरी उम्मीद भी आँसू बनकर बह गई।

दृश्य 19. समय: शाम का समय। स्थान: सुनैना का पैतृक घर (मायके का दरवाज़ा)
रामलाल जब चलते-चलते रास्ते के मोड़ पर मुड़ा और सुनैना की नज़रों से पूरी तरह ओझल हो गया, तब जाकर सुनैना को एक कड़वी हकीकत का अहसास हुआ। उनके मन ने उनसे कहा कि जो इंसान कलकत्ता से यहाँ तक के पूरे बारह घंटों के लंबे सफर में मुझसे सीधे मुँह एक शब्द भी नहीं बोला, जिसने पिछले दो महीनों में प्यार की दो मीठी बातें तक नहीं कीं, आज उसे भला क्या पड़ी है जो जाते-जाते मुझे एक बार पलटकर देख जाएगा? रामलाल के इस बेहद रूखे और निष्ठुर व्यवहार से सुनैना का मन किसी अनजानी अनहोनी के डर से भीतर ही भीतर बैठने लगा। उनके दिल को लगने लगा कि कहीं यह विदाई हमेशा-हमेशा के लिए तो नहीं है?

दृश्य 20. समय: ढलती शाम। स्थान: मायके के घर का आँगन
काफी देर तक दरवाज़े की ओट पर खड़ी-खड़ी सुनैना ने अचानक अपना माथा झटका, जैसे वे उस डरावने विचार को अपने दिमाग से निकाल फेंकना चाहती हों। वे खुद को समझाती हुई अपने दुखी मन को ढाँढ़स बांधने लगीं। उन्होंने मन ही मन सोचा, "वो तो शहर के रहने वाले रसूखदार सेठ हैं, और मैं ठहरी गाँव-देहात की सीधी-सादी लड़की। अभी नए-नए शहर के तौर-तरीके सीख रही हूँ। कोई बात नहीं, धीरे-धीरे जब समय बीतेगा और उन्हें मेरी याद सताएगी, तो वो एक दिन खुद मुझे अपने पास लेने ज़रूर आएंगे।" इस तरह अपने ही दिल को झूठी तसल्ली देती हुई वे दरवाज़े से हटीं और भारी कदमों से अपने घर के अंदर चली गईं।

दृश्य 21. समय: सुबह का समय। स्थान: घर की रसोई और आँगन
मायके आने के बाद सुनैना ने अपने ससुराल के उस सारे रोने-धोने और अकेलेपन को अपने काम के पीछे छुपा लिया। समय अपनी गति से बीतने लगा और सुनैना चाची का पूरा दिन अपने बूढ़े माँ-बाप और दोनों छोटे भाइयों की देख-रेख तथा उनकी सेवा में कटने लगा। वे सुबह जल्दी उठकर आँगन की लिपाई करतीं, सबके लिए सादा खाना बनातीं और भाइयों के कपड़ों को करीने से सहेजतीं। मायके का वही पुराना अपनापन और अपनों की सेवा का यह सुकून उनके जख्मों पर मरहम लगाने लगा, लेकिन उनकी आँखें रोज़ सुबह उठकर घर की चौखट को एक बार ज़रूर निहारती थीं, इस उम्मीद में कि शायद आज कलकत्ता से कोई डाकिया उनके नाम की चिट्ठी लेकर आ जाए।
दृश्य 22. समय: सुबह का समय। स्थान: रामलाल का हाउसिंग कॉम्प्लेक्स, कलकत्ता
रामलाल सफ़र पूरा करके पूरे बारह घंटे बाद अपने घर कलकत्ता पहुँचा। घर के मुख्य द्वार पर कदम रखते ही उसने आँगन के ओसारे में आराम कर रहे अपने बूढ़े माँ-बाप को बाहर की खिड़की से ही झांक कर देख लिया। उसने उनसे बात करना या सफर की खैरियत बताना भी ज़रूरी नहीं समझा, और सीधे अपनी बाड़ी (कॉम्प्लेक्स) के भाड़े में रहने वाले एक बंगाली किरायेदार के घर के अंदर चला गया। उस परिवार में दो नौजवान युवक, उनकी सत्रह-अठारह साल की एक जवान बहन अनीता और उनके माँ-बाप रहा करते थे। उस पूरे परिवार का कलकत्ता में एक होटल चलाने का काम था।

दृश्य 23. समय: दोपहर का समय। स्थान: किरायेदार का घर और होटल
उस किरायेदार परिवार की जिंदगी का ढंग बिल्कुल अलग था। दिन भर भाई, बहन और माँ-बाप मिलकर होटल में आने वाले लोगों को खाना खिलाते और कड़ी मेहनत करते थे। लेकिन जैसे ही रात ढलती, पूरा परिवार एक साथ बैठ जाता और बिना किसी लाग-लपेट के शराब और लज़ीज़ कबाब का पूरा आनंद लेता। उनकी रोज़ की दिनचर्या यही थी। सुनैना को गाँव छोड़ आने के बाद अब तो रामलाल भी खुद को हर बंधन से पूरी तरह आज़ाद महसूस कर रहा था। उसके दिल से मर्यादा का डर गायब हो चुका था, इसलिए वह अक्सर बिना किसी बुलावे के भी उस बंगाली परिवार को कंपनी देने उनके घर पहुँच जाया करता था।

दृश्य 24. समय: रात का समय। स्थान: किरायेदार के घर का बैठकखाना
इमारत का मुख्य मकान मालिक होने के नाते, उस होटल वाले परिवार में रामलाल की आव-भगत और खातिरदारी भी हमेशा ठीक-ठाक ही हुआ करती थी। कभी-कभार तो रामलाल को अपनी रईसी दिखाने का ऐसा दौरा पड़ता कि वह उन्हें अपने मकान मालिक होने का पूरा अहसास दिला देता। वह महफ़िल में बैठे उन पाँचों व्यक्तियों की शराब और कबाब का पूरा का पूरा खर्च अकेले अपने दम पर उठा लेता था। रामलाल यह भारी खर्च उठाता भी क्यों न, उसे अब महफ़िल में शराब पीने के साथ-साथ खाने के लिए अपनी पसंद का तीखा और मसालेदार मांसाहारी भोजन जो मिल जाया करता था। यही नहीं, उस परिवार के लोग रामलाल की इस दरियादिली के बदले, उसके घर में रह रहे बूढ़े माँ-बाप के लिए भी हर रोज़ आदर के साथ भोजन की दो सजी-सजाई थाली भिजवा दिया करते थे। और उन दोनों बूढ़ो के लिए खाना बनाने वाला था ही कौन। 

दृश्य 25. समय: रात का समय। स्थान: किरायेदार का घर, कलकत्ता
कलकत्ता में ये सब घटनाएँ रोज़ क्रमवार तरीके से लगातार घटती रहीं। रामलाल के दिन बिना किसी फिक्र और जिम्मेदारी के, शराब, कबाब और नई महफ़िलों के मजे में कटते रहे। उसे भूलकर भी अपनी पत्नी सुनैना या उसके प्रति अपने कर्तव्यों का ख्याल नहीं आता था। उसके लिए अब हर रात एक नया जश्न बन चुकी थी, जहाँ वह अपनी तथाकथित आज़ादी के नशे में पूरी तरह डूबा रहता था।

दृश्य 26. समय: दोपहर का समय। स्थान: सुनैना के गाँव की पगडंडी
इधर गाँव में, धीरे धीरे 6 महीने बीत चुके थे सुनैना हर बीतते दिन के साथ रामलाल को लिखी अपनी चिट्ठियों के जवाब का बेसब्री से इंतज़ार कर रही थी। उसका यह इंतज़ार दिन व दिन कम होने के बजाय बढ़ता ही चला जा रहा था। धीरे-धीरे एक हफ़्ता बीता, फिर महीना और अब तो पूरे छह महीने गुजर गए। सुनैना इन छह महीनों में रामलाल को पूरे बारह पत्र लिख चुकी थी, जिनमें उसने अपने दिल की हर व्याकुलता और खैरियत लिखी थी। लेकिन कलकत्ता से अब तक एक भी चिट्ठी का जवाब नहीं आया था। सुनैना जब भी अपने गाँव की धूल भरी पगडंडी पर डाकिये को आते देखती, तो दौड़कर उसे रोक लेती और कलकत्ता से आने वाली किसी चिट्ठी के बारे में बड़ी उम्मीद से ज़रूर पूछती। डाकिया हर बार ना में सिर हिला देता, और अब सुनैना का दिल धीरे-धीरे बैठता ही चला जा रहा था।

दृश्य 27. समय: ढलती शाम। स्थान: सुनैना के मायके का ओसारा
रामलाल के इस तरह मुँह मोड़ लेने और उसकी इस घोर बेकद्री से अब सुनैना के सीधे-सादे माँ-बाप भी बुरी तरह परेशान रहने लगे थे। बेटी की बुझी हुई आँखें और हर वक्त चौखट को निहारना उनके बुजुर्ग दिलों को अंदर तक छलनी कर देता था। आख़िरकार, एक दिन सुनैना के बुजुर्ग पिता जी से रहा नहीं गया। वे अपनी बेटी का घर बसाने की खातिर अपने गाँव से पूरे 45 किलोमीटर दूर, शहर के मुख्य टेलीफोन एक्सचेंज गए ताकि कलकत्ता ट्रंक कॉल लगाकर रामलाल से सीधे बात कर सकें।
लेकिन उन दिनों के ढीले-ढाले सिस्टम की वजह से लाइन नहीं मिल पाई। घंटों इंतज़ार के बाद उनकी यह बड़ी कोशिश पूरी तरह नाकाम रही, एक्सचेंज के चक्कर काटने में उनके पैसे भी जाया हो गए, और इस उम्र में इतनी लंबी तथा थका देने वाली यात्रा के कारण घर लौटते-लौटते बुजुर्ग को तेज़ बुखार भी चढ़ गया। सुनैना अपने बीमार पिता के सिर पर पानी की पट्टियाँ रखती और चुपचाप रोती, यह सोचकर कि उसकी किस्मत ने उसके परिवार को किस दोराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है।
दृश्य 28. समय: रात का समय। स्थान: झलक सिंह का कमरा 
कमरे में डिबरी की मद्धम रोशनी हिल रही थी। सुनैना अपने बीमार पिता जी के पास आई, उसने हाथ में पकड़ा काढ़े का गरम गिलास उन्हें दिया और उनकी ओढ़ी हुई चादर को करीने से ठीक करते हुए बेहद लाडले और शिकायती लहजे में बोली, "पिता जी, आप तो खा-मो-खा परेशान होने इतनी दूर चले गए। जाते हुए मुझे बताया भी नहीं, अगर बताते तो इतनी कड़कड़ाती दुपहरी में मैं आपको कभी अकेले जाने ही नहीं देती।"
उसके पिता जी ने कांपते हाथों से गिलास थामा, उनकी आँखों में बेटी के लिए बेपनाह ममता और बेबसी तैर रही थी। वे भारी आवाज़ में बोले, "मैं जानता हूँ बेटा कि तू मुझे नहीं जाने देती। पर जब से तू कलकत्ता से लौटी है, तेरे चेहरे का रंग हमेशा उड़ा रहता है। मुझे तेरा यह छुपा हुआ दुःख देखा नहीं जाता बेटी...!" सुनैना के पिता जी अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाए थे कि उनके सीने से एक दर्दभरी तेज़ खाँसी उठी और वे खांसने लगे।

दृश्य 29. समय: रात का समय। स्थान: पिता जी का बिस्तर
पिता को तकलीफ में देख सुनैना का कलेजा कांप उठा। उसने तुरंत आगे बढ़कर पिता के हाथ से काढ़े का गिलास वापस ले लिया और उनकी पीठ सहलाते हुए अपनी आँखों के उमड़ते आंसुओं को ज़बरदस्ती रोककर बोली, "पिता जी, दुःख कैसा? मैं तो आप लोगों के बीच यहाँ मायके में बहुत खुश हूँ। मुझे कोई दुःख नहीं है।"
झलक जी ने खांसते हुए अपनी बेटी का भीगा हुआ चेहरा देखा और एक लंबी, ठंडी सांस लेकर बोले, "हाँ बेटा, तू खुश तो है ही... लेकिन बेटी का दुःख उसके माँ-बाप ही समझ सकते हैं। बेटियाँ चाहे जितनी भी बड़ी हो जाएं, वे कभी भी अपने माँ-बाप से अपना सुख दुःख छुपा नहीं सकतीं। पता नहीं दामाद जी ने अभी तक तुम्हारी एक भी चिट्ठी का जवाब क्यों नहीं दिया? कल सुबह मैं फिर शहर जाऊँगा और चाहे जो हो जाए, उनसे फोन पर बात करने की दोबारा कोशिश करूँगा..."

दृश्य 30. समय: देर रात का समय। स्थान: कमरे की चौखट
उसके पिता जी अपनी व्याकुलता में और भी कुछ कहना चाहते थे, लेकिन सुनैना ने उनका हाथ थामते हुए बीच में ही उन्हें टोक दिया। वह दृढ़ता और दुलार भरी आवाज़ में बोली, "अब आप कहीं नहीं जाएंगे पिता जी। देख नहीं रहे हैं कि सिर्फ एक ही दिन की धूप और भाग-दौड़ ने आपको कितना बीमार कर दिया है!"
कहती हुई सुनैना ने पिता जी के सीने तक चादर को दोबारा ऊपर खींचकर उन्हें अच्छे से ओढ़ा दिया, ढ़िबरी की बत्ती को थोड़ा धीमा किया और खुद भी सोने के लिए अपने कमरे की तरफ चली गई। बिस्तर पर लेटने के बाद भी उसके कानों में पिता के वही शब्द गूँज रहे थे कि 'बेटियाँ कभी माँ-बाप से अपना दुःख छुपा नहीं सकतीं।' उसने तकिए में मुँह छुपा लिया ताकि उसके रोने की आवाज़ बाहर न जा सके।

दृश्य 31. समय: रात का समय। स्थान: अनीता का कमरा, कलकत्ता
एक शाम रामलाल सीधे अनीता के होटल पर गया। वहाँ से उसने अपनी पसंद का तीखा चिकन पैक करवाया और रास्ते में आते समय शराब की सरकारी दुकान से एक अध्धा (शराब की बोतल) भी लेता आया। अनीता उस वक्त अपने घर के कमरे में बिल्कुल अकेली थी। रामलाल सीधे पैर पटकता हुआ उसके कमरे के अंदर चला गया। उसने मेज पर चिकन का पैकेट खोला और बिना समय गँवाए काँच के दो गिलासों में शराब के कड़े पैक बना लिए।
रामलाल ने बिना झिझक के अपना पैक गटागट एक ही सांस में खाली कर दिया। इसके ठीक बाद, वह अनीता के बिल्कुल पास आया, उसका हाथ पकड़कर उसे बिस्तर पर बिठाया और जबरदस्ती शराब का दूसरा गिलास उसके मुँह से लगा दिया। एक-दो बार अनीता ने लोक-लाज के डर से मना करने की कोशिश तो की, पर शराब के नशे में चूर मकान मालिक रामलाल की तीसरी गुज़ारिश को वह टाल न सकी और उसने भी वह कड़ा जाम अपने गले से नीचे उतार लिया।

दृश्य 32. समय: देर रात का समय। स्थान: अनीता का कमरा, कलकत्ता
जैसे ही अनीता ने वह पैक खाली किया, शराब का तेज़ नशा उसके सिर चढ़कर बोलने लगा। रामलाल के चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान तैर गई और उसने अनीता का हाथ और कसकर पकड़ लिया। अनीता का लोक-लाज का डर अब उस तीखे नशे के पीछे कहीं खो चुका था। रामलाल ने कमरे की एकमात्र खिड़की का परदा पूरी तरह गिरा दिया और लाइट बुझा दी।
उस रात, उस बंद कमरे के भीतर सेठ रामलाल ने सुनैना के साथ किए गए शादी के सात फेरों और अपनी मर्यादा की सारी धज्जियाँ उड़ा दीं। वह अनीता के साथ एक ऐसे रास्ते पर आगे बढ़ गया जहाँ से वापस लौटना नामुमकिन था, और इस तरह सुनैना के सुहाग पर कलकत्ता की चकाचौंध का एक काला साया मंडराने लगा।

दृश्य 33. समय: अगली सुबह। स्थान: रामलाल के घर का ओसारा
अगली सुबह जब सूरज की धूप हाउसिंग कॉम्प्लेक्स के आँगन में फैली, तो रामलाल के बूढ़े माँ-बाबू जी हमेशा की तरह अपने कमरे के बाहर खटिया पर बैठे थे। अनीता रोज़ की तरह सुबह-सुबह उनके लिए चाय और नाश्ता लेकर आ गई थी, लेकिन आज उसके चेहरे पर एक अजीब सी घबराहट और नजरें चुराने की बेबसी साफ़ दिख रही थी।
बूढ़े माता-पिता जो गाँव से आए थे, वे अनीता की इस सेवा से बहुत खुश रहते थे, लेकिन वे इस बात से पूरी तरह अनजान थे कि जिस लड़की को वे अपनी बहू सुनैना की तरह मान रहे हैं, वह उनके बेटे के साथ किस खेल में शामिल हो चुकी है। रामलाल भी अपने कमरे से मूंछों पर ताव देता हुआ बाहर निकला, मानो उसने कोई बहुत बड़ी जंग जीत ली हो।

दृश्य 34. समय: शाम का समय। स्थान: किरायेदारों का होटल
शाम के वक्त जब अनीता के दोनों भाई और माँ-बाप होटल का काम निपटाकर वापस बाड़ी की तरफ लौट रहे थे, तो उनके मन में मकान मालिक रामलाल के प्रति आदर और बढ़ गया था। उन्हें लग रहा था कि रसूखदार सेठ जी उनके पूरे परिवार का इतना ख्याल रखते हैं, अनीता को अपनी छोटी बहन जैसा मानते हैं और उनके घर का खर्च तक उठा लेते हैं।
वे इस कड़वे सच से बिल्कुल बेखबर थे कि रामलाल की नजरें उनकी सत्रह-अठारह साल की जवान बहन पर टिक चुकी हैं और मकान मालिक होने के रसूख का वह किस कदर गलत फायदा उठा रहा है। कलकत्ता की उस चकाचौंध के पीछे एक बहुत बड़ा तूफ़ान धीरे-धीरे आकार ले रहा था, जिससे सुनैना का पूरा जीवन बिखरने वाला था।

दृश्य 31. समय: रात का समय। स्थान: अनीता का कमरा, कलकत्ता
एक शाम रामलाल सीधे अनीता के होटल पर गया। वहाँ से उसने अपनी पसंद का तीखा चिकन पैक करवाया और रास्ते में आते समय शराब की सरकारी दुकान से एक अध्धा भी लेता आया। अनीता उस वक्त अपने घर के कमरे में बिल्कुल अकेली थी। रामलाल सीधे पैर पटकता हुआ उसके कमरे के अंदर चला गया। उसने मेज पर चिकन का पैकेट खोला और बिना समय गँवाए काँच के दो गिलासों में शराब के कड़े पैक बना लिए।
रामलाल ने बिना झिझक के अपना पैक गटागट एक ही सांस में खाली कर दिया। इसके ठीक बाद, वह अनीता के बिल्कुल पास आया, उसका हाथ पकड़कर उसे बिस्तर पर बिठाया और जबरदस्ती शराब का दूसरा गिलास उसके मुँह से लगा दिया। एक-दो बार अनीता ने लोक-लाज के डर से मना करने की कोशिश तो की, पर शराब के नशे में चूर मकान मालिक रामलाल की तीसरी गुज़ारिश को वह टाल न सकी और उसने भी वह कड़ा जाम अपने गले से नीचे उतार लिया।

दृश्य 32. समय: रात। स्थान: अनीता का कमरा, कलकत्ता
ग्लास को एक ही घूंट में खाली करते हुए और मुंह में चिकन का टुकड़ा डालते हुए अनीता ने आशंका भरे लहजे में पूछा, "अगर मेरे भाइयों को इस बात का पता चला तो?"
"तो क्या हुआ? हम कोई पहली बार थोड़े ही पी रहे हैं!" रामलाल ने तपाक से उसकी बात काटते हुए कहा।
अनीता ने सीधे रामलाल की आँखों में झाँका। उसके चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कान तैर गई। वह धीमे से बोली, "देखो रामू……"
यह उस दिन की पहली और सबसे बड़ी शुरुआत थी। अनीता ने अपनी ज़िंदगी में पहली बार सम्माननीय 'रामलाल जी' को सिर्फ 'रामू' कहकर पुकारा था। रामलाल, जो उस वक्त कांच के गिलासों में दूसरा पेग ढाल रहे थे, अनीता के मुंह से अपने लिए यह नाम सुनते ही अंदर तक गदगद हो उठे। उनके दिल की धड़कनें तेज हो गईं। वे तो बरसों से यही चाहते थे कि अनीता उनके करीब आए और उन्हें इसी तरह प्यार से कोई नाम दे।
अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए अनीता ने कहा, "हम पहली बार नहीं पी रहे हैं, वह तो ठीक है। लेकिन मैं एक जवान लड़की हूँ और तुम एक मर्द। इस बंद कमरे में हम दोनों एकदम अकेले हैं और ऊपर से हमारे भीतर यह शराब उतर रही है। ऐसे में कहीं मन बहक गया तो?"
अनीता की यह बात सुनते ही जैसे रामलाल की बरसों पुरानी मुराद पूरी हो गई। उनके सब्र का बांध टूट गया। इसके बाद बातों का सिलसिला थमा और जाम का दौर तेज हो गया। फटाफट तीसरा, चौथा और फिर पाँचवा पेग गले से नीचे उतारने के बाद, शराब के नशे और वासना में डूबे रामलाल ने अनीता को अपनी बांहों में भींच लिया। वे पागलों की तरह उस पर चुंबनों की बौछार करने लगे।
इस अचानक हुए हमले से अनीता शुरू में सकपकाई। उसने अपनी नजाकत भरी अदाओं से रामलाल को पीछे धकेलने और खुद को छुड़ाने का थोड़ा नाटक, थोड़ा विरोध किया। लेकिन शराब का नशा और रामलाल की बेकाबू होती ताकत के आगे उसका वह कमजोर विरोध ज्यादा देर टिक नहीं सका। आखिरकार, एक गहरी सांस छोड़ते हुए उसने खुद को पूरी तरह से रामलाल के हवाले कर दिया। कलकत्ता की उस रात ने अनीता की जिंदगी का रुख हमेशा के लिए बदल दिया था।





















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