जीना मरना,
हँसना रोना,
जीवन का हर कोना कोना,
खुद में ख़ुदा,
आत्मा ही परमात्मा है,
मन को अजायब मानती है,
जनता सब जानती है।
गुरुद्वारा माता पिता,
बिना उनके ये जीवन नहीं,
फिर भी वृद्ध आश्रम छोड़ आती है,
जनता सब जानती है।
सत्संगो में तो तन गया,
मन तो धन संचो में गया,
रुक रुक ताले तिजोरी निहारती है,
जनता सब जानती है।
पति ही प्रमेश्वर,
तेरा वही सर्वेश्वर,
वृहद् पूजन क्यूँ करती है,
जनता सब जानती है।
पुरुष स्वच्छंद,
अर्थ ही उसका आनंद,
बूढी आँखे आँगन निहारती है,
जनता सब जानती है।
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